वर्णन आता है कि सूर्यग्रहण के पर्व पर स्नान के लिए भगवान श्रीकृष्ण द्वारका से कुरुक्षेत्र पधारे । उसी पर्व पर ब्रज से भी गोप-गोपियाँ भी आए । उनके साथ शायामसुन्दरजी की परम प्रिया श्री राधारानी भी थीं । भगवान श्रीकृष्ण से उनका मिलन और एकान्त वार्तालाप भी हुआ । जब श्री राधारानी लौटकर आईं तो सखियों ने पूछा कि इतने दिनों के बाद उनसे मिलकर आपको कैसा लगा ? कितने सुख की अनुभूति हुई ? उस समय राधारानी ने कहा - सखी ! क्या बताऊँ ! कृष्ण भी वही थे और मैं भी वही राधा थी और हम दोनों का मिलन भी हुआ । किन्तु उस समय भी मेरा मन वृन्दावन के यमुना-तट पर वंशी बजाते हुए श्रीकृष्ण के ध्यान में ही डूबा हुआ था ।
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