कंस अर्थात जिसके लिए जीवन ही सब कुछ है । वह देहाभिमानी है और मृत्यु न होने पाए, यही उसका अभिष्ट है । अपने पिता को कारागार में डालकर स्वयं राजा बनने से उसे कोई संकोच या लज्जा का अनुभव नहीं होता । वह कर्म का वह विकृत रूप है जो भगवान को जन्म देने वाले वासुदेव और देवकी को भी कारागार में डालकर बन्दी बना लेता है । कर्म का यह पक्ष अनगिनत व्यक्तियों के जीवन में दिखाई देता है । भगवान मथुरा के कारागार में प्रगट होते हैं तो वे वासुदेव को आदेश देते हैं कि तुम मुझे उस पार ले चलो । यह 'दूसरा पार' भाव का पक्ष है । क्रिया धर्म का पालन करते हुए व्यक्ति का ह्रदय शुद्ध हो जाता है, उसमें भक्ति भावना का उदय होता है और रस का संचार होता है । नन्द-यशोदा इसी भाव के मूर्तिमान स्वरूप हैं । यहीं पर कृष्ण का पालन होता है । यहाँ उनके द्वारा अगणित लीलाएं होती हैं । यहीं वंशी का मधुर स्वर निनादित होता है । यहाँ वंशी के रस को ग्रहण करने वाले हैं । मथुरा, द्वारिका और कुरुक्षेत्र में ऐसा कोई रसग्राही नहीं अतः वहाँ वंशी बजाना संभव नहीं ।
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