Saturday, 12 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भरतजी कहते हैं कि मुझे न तो अर्थ चाहिए, न धर्म चाहिए और न ही मोक्ष चाहिए । तो फिर क्या चाहिए क्योंकि पुरुषार्थ के तो ये चार ही फल हैं ? इसका अर्थ तो यही हुआ कि कुछ भी नहीं चाहिए । श्रीभरत बड़े चतुर निकले । वे कहते हैं कि मुझे कुछ नहीं चाहिए बस प्रभु के चरणों में रति चाहिए । अब जैसे आपके घर कोई अतिथि आए और आप उसे भोजन करने के लिए कहें, पर वह अस्वीकार कर दे । फिर आप यह सोचकर कि फलाहारी होंगे, उनसे कहें कि सन्तरा ले लें । वे उसे भी नाहीं कर दें । यदि तब आप उनसे कहें कि महाराज कुछ तो लीजिए और वे कहें कि फल नहीं, फलों का रस ही दे दीजिए, तो आप यही न सोचेंगे कि ये बड़े चतुर निकले । श्रीभरत जी भी उसी तरह चारों फल के स्थान पर भगवान के चरणों में रति के रूप में वह चाहते हैं जहाँ समग्र रस एकत्रित हैं । जिस भाग का कोई महत्व नहीं है उस असार को त्यागकर वे सार को ही ग्रहण करना चाहते हैं ।

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