वंशी और धनुष-बाण को लेकर एक बड़ा मधुर प्रसंग आता है । गोस्वामीजी वृन्दावन गए तो, स्वाभाविक ही था, वे श्यामसुंदर भगवान कृष्ण के मन्दिर में दर्शन के लिए गए । गोस्वामीजी भगवान राम और भगवान कृष्ण में कोई अन्तर मानते ही नहीं । गोस्वामीजी ने कृष्ण गीतावली की रचना की है, जिसमें उन्होंने भगवान कृष्ण की लीलाओं का वर्णन किया है । कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो अनन्यता का दावा करते हुए यह सोचते हैं कि अपने इष्टदेव को छोड़कर किसी अन्य देवता को प्रणाम नहीं करना चाहिए । ऐसे एक व्यक्ति वहाँ थे जिनका नाम था परशुराम । तुलसीदासजी जाकर श्यामसुंदरजी के सामने खड़े हुए और प्रणाम करने ही जा रहे थे कि ठीक उसी समय उस व्यक्ति ने पीछे से कहा - जो अपने इष्ट को प्रणाम करता है वह तो भक्त है पर जो दूसरे के इष्ट को प्रणाम करता है वह मूर्ख है । गोस्वामीजी ठिठके । यह नहीं कि अपने आपको अनन्य सिद्ध करने के लिए वे मन्दिर से बाहर आ गए । अपितु उन्होंने श्यामसुंदर से निवेदन किया कि प्रभु ! आपकी इस शोभा के क्या कहने ! मैं आपसे एक प्रार्थना करता हूँ कि आप वंशी छोड़कर जरा हाथों में धनुष-बाण ले लें । प्रभु ने तत्काल वंशी का परित्याग कर दिया और धनुष-बाण ले लिया । इससे मानो यह भी सिद्ध हो गया कि भगवान राम और भगवान कृष्ण एक ही हैं ।
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