Friday, 11 August 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी ने दृढ़ विश्वासपूर्वक ही रामनाम का आश्रय लिया और जीवन में धन्यता का अनुभव किया । इसी तरह से रामकथा की बात भी उनके ह्रदय में आई और जिसके परिणामस्वरूप रामकथा के रूप में 'मानस' का प्राकट्य हुआ । गुरु नरहरिदास बाल्मीकि रामायण से संस्कृत में कथा सुनाते थे । गोस्वामीजी को बार-बार सुनने के बाद लगा कि यह कथा तो दिव्य है । उन्होंने विचार किया कि इस कथा को मैं भाषा में बनाऊँगा । किसलिए ? क्या लोक-कल्याण के लिए ? हममें से अधिकांश व्यक्ति यही दावा करते हुए देखे जाते हैं कि हमारे जीवन का लक्ष्य एकमात्र लोककल्याण है, और वह भी निःस्वार्थ भाव से । पर गोस्वामीजी ने ऐसा कोई दावा नहीं किया । यद्यपि हम लोग कहते हैं कि गोस्वामीजी ने यह सब लोककल्याण के लिए किया पर वे तो यही कहते हैं कि बिल्कुल नहीं ! मैं तो इसे अपने लाभ की दृष्टि से भाषाबद्ध कर रहा हूँ कि जिससे और अच्छी तरह समझ सकूँ । भक्त लोग जितने अच्छे स्वार्थी होते हैं उतना स्वार्थी कोई नहीं होता । मूर्ख स्वार्थी तो बहुत होते हैं पर 'अच्छे स्वार्थी' बड़े चतुर होते हैं । वे अपने लिए सबसे अच्छी वस्तु को पाने की कामना करते हैं । संसार की छोटी-मोटी चीजों में उनकी रुचि नहीं होती ।

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