गोस्वामीजी जब श्यामसुंदर से प्रार्थना करते हैं कि आप वंशी छोड़कर जरा हाथों में धनुष-बाण ले लें, इसमें गोस्वामीजी का तात्पर्य था कि द्वापर युग में वंशी तो केवल ब्रजभूमि में ही बज पाई । इस कलियुग में वंशी सुनने वाले कितने लोग होंगे । आपका धनुष-बाण बहुत आवश्यक है । वंशी सदैव आपके साथ नहीं रहती पर धनुष-बाण तो सदैव साथ रहता है । वंशी केवल भक्तों के लिए है, पर धनुष-बाण तो भक्तों और अभक्तों दोनों के लिए है । यह सर्वकालिक है । इसे आपने सर्वत्र धारण किया है अतः आप कृपा कीजिए । भगवान प्रसन्न भाव से उनकी प्रार्थना स्वीकार कर लेते हैं । धनुष-बाण के प्रति गोस्वामीजी की जो धारणा है उसे वे बड़े विनोद भरे स्वर में कह देते हैं कि भगवान कृष्ण के हाथ में वंशी देखकर किसी को डर नहीं लगता पर भगवान राम के कर-कमलों में धनुष-बाण देखकर डर लगना स्वाभाविक है । किसी ने मुझसे पूछ दिया कि क्या डर लगना चाहिए ? मैंने कहा कि डर लगना चाहिए क्योंकि भगवान से जब डर लगना बन्द हो जाता है तो व्यक्ति के जीवन में, संसार में सब पाप और बुराइयाँ आ जाती हैं । भगवान से डरना अवश्य चाहिए ।
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