द्वापर युग में एक ब्रजभूमि को छोड़कर सर्वत्र एक ऐसा अन्धकार व्याप्त है जहाँ रामायण काल के महान भक्तों और चरित्रों के मिलने की कोई सम्भावना ही नहीं थी । वहाँ न तो श्री भरत मिलेंगे, न हनुमानजी मिलेंगे और न ही लक्ष्मणजी के सदृश्य पात्र मिलेंगे । अब इस कथन को भगवान कृष्ण की कमी के रूप में न समझ लीजिएगा । वे तो वही हैं । जो राम हैं वही कृष्ण हैं । मानो इसके द्वारा भगवान बता देते हैं कि मैं दिव्य राज्य तब बना पाऊँगा जब आपकी धारणा, आपकी भक्ति-भावना पूरी तरह से उस राज्य के अवतरण के लिए उपयुक्त हो । इसका अर्थ यह भी नहीं लेना चाहिए कि जब रामराज्य बन ही नहीं सकता तो उसके लिए प्रयास ही क्यों करें ! नहीं, नहीं रामराज्य स्थापना का संकल्प, उच्च आदर्श पर चलने की चेष्टा हम सबको तो करनी ही चाहिए और जिस दिन भी हममें से एक भी भरत बन सका, उसी दिन रामराज्य भी स्थापित हो जाएगा ।
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