गोस्वामीजी ने अपने जीवन में अभाव और पीड़ा की अनुभूति की । ऐसे समय में उन्हें नरहरिदास के रूप में एक सन्त, एक गुरु का आश्रय मिला । समाज जिसे ठुकरा देता है, सन्त उसे भी स्वीकार कर लेते हैं । गुरुदेव ने उनके सिर पर अपना हाथ रखा और - रामबोला राखो नाम - उनका नाम रखा रामबोला । उन्होंने कहा - पुत्र ! स्वार्थ और परमार्थ की सिद्धि एकमात्र रामनाम से होती है । तुम रामनाम का ही आश्रय लो । गुरुजी अपने आश्रम में नित्य मायण की कथा सुनाया करते थे । गोस्वामीजी भी नित्य कथा श्रवण करते थे । अपनी रचनाओं में गोस्वामीजी ने इसका संकेत किया है । वे कहते हैं कि मैं उस गम्भीर कथा को पूरी तरह से समझ नहीं पाता था । पर मेरे गुरुदेव इतने उदार थे कि उन्होंने बार-बार कथा सुनाई, तब कुछ-कुछ समझ सका । गोस्वामीजी ने रामनाम और रामकथा दोनों को अपने जीवन में अमूल्य थाती बना लिया ।
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