भगवान शंकर पार्वतीजी को कथा सुनाते समय सावधान करते हुए कहते हैं कि यह कथा सबको नहीं सुनानी चाहिए । दुष्ट और हठी व्यक्ति इस कथा को सुनने के अधिकारी नहीं हैं । भगवान शंकर ने यह नियम बना लिया था, इसलिए उनकी कथा में श्रोता के रूप में एकमात्र पार्वतीजी ही दिखाई देती हैं । कागभुशुण्डिजी की कथा भी सुमेरु पर्वत की ऊँचाइयों में ही जाकर सुनी जा सकती हैं और उसे सुनने के लिए हंसों के समान विमल विवेक वृत्ति वाला ही वहाँ पहुँच सकता है । याज्ञवल्क्यजी भी भरद्वाजजी को कथा सुनाते हैं । इस प्रकार तीनों घाटों के श्रोता सुपात्र हैं, रामकथा सुनने के अधिकारी हैं । पर गोस्वामीजी का श्रोता कौन है ? वे किसे कथा सुना रहे हैं ? गोस्वामीजी बड़ी अनोखी बात कहते हैं कि मैं एक दुष्ट को कथा सुना रहा हूँ । - महाराज ! शंकरजी ने तो इस कथा को दुष्टों को सुनाने के लिए रोक लगा रखी है । आप किस दुष्ट को कथा सुना रहे हैं ? वे कहते हैं कि मैं अपने दुष्ट मन को कथा सुना रहा हूँ । मेरा यह दुष्ट मन रामकथा के माध्यम से धन्य हो गया । इस दिव्य रचना की यही विशेषता है कि भगवान शंकर की कथा में दुष्टों का प्रवेश वर्जित है पर गोस्वामीजी की रामकथा में वे भी प्रवेश पाकर अपने जीवन को धन्य बना सकते हैं ।
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