'विनयपत्रिका' में गोस्वामीजी अपने दोषों का वर्णन करते हैं तो उसे पढ़कर लगता है कि जैसे एक रोगी किसी डॉक्टर के पास जाता है और रोग के निदान के लिए डाक्टर उसके रक्त का परीक्षण करता है । अब साधारण आँखों से रक्त के कीटाणु दिखाई नहीं देते पर डाॅक्टर एक ऐसा यन्त्र सामने रख लेता है कि जिससे वह न दिखनेवाला कीटाणु कई हजार गुना बढ़े रूप में दिखाई देने लगता है । गोस्वामीजी भी इसी पद्धति से अपने दोषों को देखते हैं । और सचमुच इसी ढंग से देखने पर ही, यदि हम रोगी हैं तो, हमारे रोग के कीटाणु हमें दिखाई देंगे अन्यथा उन्हें देख पाना सम्भव नहीं है । गोस्वामीजी 'मानस-रोगों' के सन्दर्भ में एक विलक्षण बात कहते हैं कि 'मानस रोग' के कीटाणु तो हम सबके भीतर होते ही हैं । गोस्वामीजी ने इस सत्य को जीवन में समझा और उन्होंने रामायण के माध्यम से हम सबको बहुत बड़ा सन्देश दिया । इसलिए उन्होंने रामायण का समापन रामकथा से नहीं किया । उन्होंने रामायण के अन्त में 'मानस रोगों' का वर्णन किया ।
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