जो लोग सिंहासन पर बैठ जाते हैं, वे प्रायः शीशा देखना छोड़ देते हैं । इसका अभिप्राय यह है कि सिंहासन पर बैठने के बाद तो शीशा देखना और भी जरूरी हो जाता है । पहले जितना देखते थे, उससे कहीं और अधिक शीशा देखने की आदत डालनी चाहिए । क्योंकि जो व्यक्ति सिंहासन पर नहीं है, वह तो केवल अपने अथवा अपने परिवार के लिए है; परन्तु जो सिंहासन पर है, उस पर तो सारे समाज, सारे देश का उत्तरदायित्व है । अतः जिस व्यक्ति का संबंध अनेक व्यक्तियों से तथा समाज से जुड़ा हुआ है, उसे तो सजग होकर स्वयं पर दृष्टि डालनी चाहिए कि हम सही हैं या नहीं ? हमारे क्रियाकलाप ठीक हैं या नहीं ? इस प्रकार यहाँ तीन बातें कही गयी हैं - सार्वजनिक रूप से शीशा देखना, सिंहासन पर बैठकर शीशा देखना और प्रशंसा सुनते समय शीशा देखना, ये तीनों बड़े महत्व की और प्रेरणादायी हैं । प्रशंसा सुनते समय अर्थात दूसरों की आंख से अपने को देखना और शीशा देखने का अर्थ है अपनी आँख से स्वयं को देखना । दूसरों की आंख से अपने आपको देखने का अर्थ है, दूसरों द्वारा की गयी प्रशंसा को ही अपना वास्तविक स्वरूप समझ बैठना और इन प्रशंसा करने वालों का क्या ठिकाना ?
Sunday, 31 January 2016
Saturday, 30 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ...........
....कल से आगे......
जब कोई व्यक्ति अकेले में भगवान के सामने बैठता है, तो कहता है - मैं बड़ा बुरा हूँ, बड़ा पापी हूँ, लेकिन यही बात कोई समाज में उसके लिए कह दे कि वह बड़ा बुरा और पापी है, तो फिर देखिए कि उसका सारा क्रोध कैसे वेग से निकलता है । शीशे के साथ एक बात जुड़ी हुई है कि हर व्यक्ति उसे पसन्द करता है, पर अकेले में, सार्वजनिक रूप से नहीं । इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अकेले में शीशा देखकर प्रसन्न होता है, लेकिन अगर कोई दूसरा कह दे कि जरा शीशे में अपना मुँह तो देखिए ! तो झगड़ा हुए बिना नहीं रहेगा । यह शीशे की बड़ी विचित्रता है । इसका अभिप्राय यह है कि हम अपने दोषों को, अपनी कमियों को जानना तो चाहते हैं, लेकिन अकेले में । हमीं देखें ! हमीं जाने ! कोई दूसरा न जान पाये । हमारे दोषों को जानकर कोई हमारी आलोचना करे, इससे हम बचना चाहते हैं, पर दशरथ जी धन्य हैं । उन्होंने साहस किया और यह साहस बड़े महत्व का हैंं । सब लोग एक स्वर में प्रशंसा कर रहे थे कि दशरथजी के समान महान और कोई नहीं है । तो उसी समय वे सभा में सबके सामने शीशा लेकर देखने लगे कि यह जो इतने मुखों से प्रशंसा हो रही है, उसमें सच्चाई कहां तक है ? कितनी सुंदर बात है ? एक तो सभा में और दूसरे सिंहासन पर ।
जब कोई व्यक्ति अकेले में भगवान के सामने बैठता है, तो कहता है - मैं बड़ा बुरा हूँ, बड़ा पापी हूँ, लेकिन यही बात कोई समाज में उसके लिए कह दे कि वह बड़ा बुरा और पापी है, तो फिर देखिए कि उसका सारा क्रोध कैसे वेग से निकलता है । शीशे के साथ एक बात जुड़ी हुई है कि हर व्यक्ति उसे पसन्द करता है, पर अकेले में, सार्वजनिक रूप से नहीं । इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अकेले में शीशा देखकर प्रसन्न होता है, लेकिन अगर कोई दूसरा कह दे कि जरा शीशे में अपना मुँह तो देखिए ! तो झगड़ा हुए बिना नहीं रहेगा । यह शीशे की बड़ी विचित्रता है । इसका अभिप्राय यह है कि हम अपने दोषों को, अपनी कमियों को जानना तो चाहते हैं, लेकिन अकेले में । हमीं देखें ! हमीं जाने ! कोई दूसरा न जान पाये । हमारे दोषों को जानकर कोई हमारी आलोचना करे, इससे हम बचना चाहते हैं, पर दशरथ जी धन्य हैं । उन्होंने साहस किया और यह साहस बड़े महत्व का हैंं । सब लोग एक स्वर में प्रशंसा कर रहे थे कि दशरथजी के समान महान और कोई नहीं है । तो उसी समय वे सभा में सबके सामने शीशा लेकर देखने लगे कि यह जो इतने मुखों से प्रशंसा हो रही है, उसमें सच्चाई कहां तक है ? कितनी सुंदर बात है ? एक तो सभा में और दूसरे सिंहासन पर ।
Friday, 29 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........
गोस्वामीजी एक चित्र प्रस्तुत करते हैं - महाराज दशरथ सिंहासन पर बैठे हुए हैं । यहीं से अयोध्याकाण्ड प्रारंभ होता है । महाराज दशरथ की सभा में चारों ओर लोग उनकी प्रशंसा कर रहे हैं और सबके मुख से यही वाक्य निकल रहा है- तीनों काल और तीनों लोक में जितने पुण्यात्मा हुए हैं, उनमें से कोई भी दशरथ के समान नहीं है और अगली पंक्ति में साधना की दृष्टि से बड़ी सांकेतिक भाषा का प्रयोग किया गया है । प्रशंसा का यह वाक्य जब महाराज दशरथ के कानों में पड़ा, तब उनके मन में क्या प्रतिक्रिया हुई ? बगल में शीशा रखा हुआ था । महाराज दशरथ ने वह शीशा उठा लिया और उसमें अपना मुँह देखने लगे । कई लोगों को विशेषकर आधुनिक राजकुल की परम्पराओं के संदर्भ में पढ़ने वालों को यह बड़ा अटपटा लगता है, किसी लेखक ने तो यहाँ तक लिख दिया कि बेचारे तुलसीराम को क्या पता था कि राजाओं की सभा कैसे होती है ? वे तो निरन्तर राजा-महाराओं से दूर रहे । अपनी कल्पना से ही उन्होंने ऐसी व्यर्थ और बेतुकी बात लिख दी । क्या कोई राजा सिंहासन पर बैठकर शीशा देखता है ? वह तो किसी एकान्त कमरे में शीशा देखकर आयेगा और सिंहासन पर बैठेगा । सभा में सबके सामने थोड़े ही शीशा देखने लगेगा, पर इस वाक्य के द्वारा गोस्वामीजी क्या बताना चाहते हैं ? यही कि अकेले में शीशा देखना तो सभी जानते हैं, पर सबके सामने शीशा देखना बड़ा कठिन काम है, साधक तो वही है, जो केवल एकान्त में ही नहीं, सबके सामने शीशा देखे । इसका अभिप्राय क्या है ?
......आगे कल ......
......आगे कल ......
Thursday, 28 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........
अयोध्या में भगवान राम के राज्याभिषेक की तैयारी चल रही थी कि अचानक एक बाधा उपस्थित हो गयी और उस समय रामराज्य का संकल्प पूरा नहीं हो सका । यह बाधा केवल त्रेतायुग की नहीं, आज की भी है । आज भी हमारे अनेक महापुरूष रामराज्य की स्थापना का संकल्प करते हैं, पर वह चरितार्थ नहीं हो पाता । इसका कारण क्या है ? जो त्रेतायुग का सत्य है, वही आज का भी सत्य हैं । जिन कारणों से त्रेतायुग में रामराज्य बनते-बनते रुक गया, उन्हीं कारणों से आज भी पूरी तौर से रामराज्य बनना संभव नहीं हो पाता और अन्त में जिस प्रक्रिया से त्रेतायुग मे रामराज्य बन पाया, उसी प्रक्रिया से जब हम चलेंगे, तभी हम क्रमशः इन दुःखों और समस्याओं का समाधान पा सकेंगे । अयोध्याकाण्ड में यही बात हमें सांकेतिक रूप से मिलती है । प्रारंभ कहां से होता है ?
Wednesday, 27 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ...........
दुख भगवान राम के भी जीवन में आते हैं । भगवान् कृष्ण के जीवन में भी आते हैं । भगवान् श्रीरामकृष्णदेव की जीवनी पढ़िए तो उनके जीवन में भी पीड़ा का पक्ष है, लेकिन उस दुख और पीड़ा के संदर्भ में उनकी दृष्टि कौन सी है ? बस यही बड़े महत्व की बात है । विभिन्न रूपों में आये हुए दुख तो हैं, लेकिन उन दुःखों को हम अपने जीवन में स्वीकार कैसे करें ? या हमारे पास कौन सी कला है, जिससे हम अपने जीवन में आये हुए दुःखों को सुखों में बदल दें; अथवा वह कौन सा पारस है हमारे पास, जिसके स्पर्श से दुखरूपी लोहा सुखरूपी सोना हो जाय ? गोस्वामीजी कहते हैं - जिसने सबके हित में अपना हित मान लिया हैंं, उसे क्या कभी दुख हो सकता है ? अपने स्व का विस्तार करके सबमें अपने को ही देखिए । और तब मानो पारस के स्पर्श से दुखरूपी लोहा भी व्यक्ति के जीवन में सुखरूपी सोना हो जाता है । यह संकेत अयोध्याकाण्ड में है ।
Tuesday, 26 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
आदर्श तो यही है कि व्यक्ति का विस्तार हो, वह सबमें अपने को ही देखने लगे, पर व्यक्ति ने इसके विपरीत अपने स्व को धीरे-धीरे समेट लिया है, अपने आप में सिमटकर समाज से अलग हो गया है और इस कारण वह अपने को नितान्त अकेला और असहाय अनुभव करता है । इसलिए वह निरन्तर अपने स्व के सुख के लिए दूसरों से सुख को छीनने की चेष्टा करता है, अपने अहं की तुष्टि के लिए दूसरों के अहं से टकराता है । दूसरों का सुख उसे नहीं सुहाता, क्योंकि वह सब अपने लिए चाहता है । उसमें किसी की भागीदारी उसे सहन नहीं होती और इसका परिणाम क्या होता है ? या तो समाज में परस्पर संघर्ष हो रहा है या ऐसा सौदा हो रहा है कि जिसमें व्यक्ति परस्पर एक दूसरे को ठगने की कोशिश कर रहे हैं, एक दूसरे को दोष दे रहे हैं, एक दूसरे की निन्दा कर रहे हैं । इस स्थिति का रामचरितमानस में बड़े सांकेतिक रूप से विश्लेषण किया गया है । आने वाले दिनों में इसकी चर्चा करेंगे ।
Monday, 25 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........
गोस्वामीजी के स्वान्तःसुखाय कहने का अभिप्राय क्या है ? जब सच्चे अर्थों में स्व और सबका भेद मिट जायेगा, विरोध मिट जायेगा, जब स्व का सुख सबका हित और सबका हित स्व का सुख हो जायेगा, तब जीवन में समग्रता आयेगी । यही रामायण का जीवन दर्शन है । अभिप्राय यह है कि जब हम दूसरों के हित में अपना हित मानते हैं, प्रत्येक व्यक्ति को सुखी देखकर हमें प्रसन्नता होती है, तब सबका सुख हमारा और हमारा सुख सबका बन जाता हैं । हमारे स्व का इतना विस्तार हो जाता हैं कि सब हमारे अपने लगने लगते हैं और इससे हमारे सुख का विस्तार होता है और हम निरन्तर दूसरों को सुख पाते हुए देखकर प्रसन्न होते हैं । तब लगता है कि यह जो सबकी उन्नति है, विजय है, सुख है, वह सब मेरा ही है, मुझे ही प्राप्त हो रहा है, वह सबमें अपने को ही देखने लगता है ।
Sunday, 24 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........
गोस्वामीजी ने सूत्र दिया कि वही कविता है, वही सम्पत्ति और वही कीर्ति है जो सबका हित करती है । लेकिन एक अन्य पंक्ति में उन्होंने एक दूसरी ही बात कह दी, जो पढ़ने में बड़ी अटपटी लगती है । दोनों परस्पर विरोधी प्रतीत होती है । जब वे रामचरितमानस लिखने लगे तो किसी ने पूछ दिया कि आप इतना परिश्रम क्यों कर रहे हैं ? उन्होंने कहा - स्वान्तःसुखाय - मैं तो अपने अन्तःकरण को सुख देने के लिए रामकथा का वर्णन कर रहा हूँ । अब दोनों बातें परस्पर विरोधी प्रतीत होती हैं । पढ़कर भ्रम होता है कि गोस्वामीजी की रचना अपने सुख के लिए है या सबके हित के लिए ? पर यही तो जीवन दर्शन का सूत्र है । क्या ? स्व और सबका भेद मिट जाना । गोस्वामीजी के जीवन में जब स्व और सबका भेद मिट गया, तब वे कहीं पर "सब कर हित" लिखते हैं और कहीं पर स्वान्तःसुखाय । इन पंक्तियों को पढ़कर हमें भ्रम इसलिए होता है क्योंकि हमारे जीवन में यह स्व और सबका भेद बना हुआ है और यह भेद केवल भेद ही नहीं, बल्कि हमारे स्व और सब परस्पर विरोधी हो गये हैं । हमारे स्व के स्वार्थ, इच्छाओं और दूसरों के स्वार्थ एवं इच्छाओं के बीच परस्पर टकराहट हो रही हैं । हमें यही चिंता बनी रहती हैं कि और सब सुख का लाभ न ले लें । व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक न होकर एक दूसरे से पृथक होकर गये हैं ।
Saturday, 23 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........
गंगा का तीसरा तीर्थ गंगासागर समर्पण का तत्व है और इसका अभिप्राय है कि सुलभता और समन्वय (हरिद्वार और प्रयाग) के पश्चात जैसे गंगा अपने आपको समुद्र में विलीन करके, नाम और रूप को खोकर अपने व्यक्तित्व से पृथक हो जाती है, ठीक उसी प्रकार अपनी कीर्ति के द्वारा, अपनी सम्पत्ति के द्वारा, कविता के द्वारा लोगों के लिए सुलभ बनकर, समन्वय के द्वारा सबको अपने में आत्मसात करके अंत में स्वयं को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देना, अपना विलय कर देना- यही मानो गंगा का गंगासागर में विलीन हो जाना है ।
Friday, 22 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........
हरिद्वार के बाद है प्रयाग । बड़ा अनोखा संकेत है । प्रयाग में गंगा और यमुना का संगम होता है और कैसा सुंदर मिलन ? गंगा बाँहें फैलाकर यमुना को अपने में समेट लेती हैं । यमुना देखने में साँवली हैं, लेकिन वहाँ पर अपने को समेटकर, अपना रूप दे देने में, अपना नाम दे देने में, इस तरह धन्य बना देने में मानो समन्वय का सूत्र हैंं । गंगा-यमुना का संगम समन्वय का सूत्र देता हैंं । हरिद्वार में पहला सूत्र हैंं सुलभता और प्रयाग में दूसरा सूत्र हैंं समन्वय । गंगा सुलभ बनी और यमुना ने समन्वय को स्वीकार करते हुए गंगा में अपने आपको विलीन कर दिया । कोई कह सकता हैंं कि गंगा तो पूरी स्वार्थी निकलीं । बेचारी यमुना की पहले एक अलग पहचान तो थी । गंगा ने उसे अपने में विलीन कर लिया, तो उसका नाम भी विलीन हो गया और रूप भी । इस विलय के बाद सब उन्हें गंगा ही तो कहते हैं, यमुना कौन कहता है ? बेचारी यमुना तो घाटे में रही, लेकिन आप जरा विचार करके देखिए कि यमुना को अपने में लीन करने के बाद गंगा ने क्या किया ? क्या वे प्रयाग में ही रुक गयीं ? नहीं ! वे आगे बढ़ती जा रही हैं । कहां जा रही हैं ? समुद्र में अपने आपको विलीन कर देने के लिए ।
Thursday, 21 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........
कविता भी हिमालय की तरह दुर्गम नहीं होना चाहिए । वह कविता जिसे केवल कवि ही समझे; कभी-कभी तो स्वयं कवि भी नहीं समझ पाते कि वे क्या कह रहे हैं और बेचारे सुनने वाले भी समझने के लिए व्यर्थ परिश्रम करते रहें, फिर भी कुछ रहस्य पल्ले न पड़े । काव्य की विशेषता यह होनी चाहिए कि वह ऊपर से नीचे उतरे। कीर्ति की विशेषता भी यही होनी चाहिए कि वह सुलभ हो और सम्पत्ति की भी विशेषता यही हो कि वह तिजोरी में बन्द ना रहे, बल्कि हरिद्वार की भूमि में उतरकर समाज की सेवा में उसका उपयोग हो, जैसे गंगा हिमालय गंगोत्री से उतरकर हरिद्वार में सबको सुलभ होती है।
Wednesday, 20 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........
....... कल से आगे.........
गंगा तो गंगोत्री से निकलती है । ऐसी स्थिति में इस श्लोक में यह कहना चाहिए था कि गंगा का सर्वश्रेष्ठ तीर्थ गंगोत्री है, लेकिन गंगोत्री का महत्व अधिक है या हरिद्वार का ? वैसे तो जो लोग गंगोत्री की यात्रा करके आते हैं, उनको बड़ी धन्यता और गौरव की अनुभूति होती हैं । उसकी तुलना में हरिद्वार जाना सरल है, पर पुराणों या ऋषियों ने बड़ी अनोखी बात कही । उन्होंने गंगोत्री को बहुत कम महत्व दिया और हरिद्वार को बड़ा बता दिया । क्यों ? उन्होंने कहा कि दोनों में यह अन्तर हैं कि गंगा को गंगोत्री में पाने के लिए बड़ा कठिन परिश्रम करना पड़ता है । बड़ी कठिनाई से ऊपर चढ़ने पर वे प्राप्त होती हैं, लेकिन हरिद्वार में यह विशेषता है कि वहाँ गंगा स्वयं नीचे उतरकर आ जाती है और व्यक्ति को सुलभता से प्राप्त हो जाती हैं, किन्तु मनुष्य की एक बड़ी विचित्र भावना है कि जो वस्तु उसे कठिनाई से मिलती है उसी को वह अधिक महत्व देता है । इसलिए जिस तीर्थ की यात्रा जितनी ही कठिन है, उसे व्यक्ति उतना ही महत्व देता है । जिसकी यात्रा जिसकी यात्रा जितनी ही सुलभ है, उसे उतना ही कम महत्वपूर्ण मानता है, लेकिन शास्त्रकारों ने कहा कि जिनमें सामर्थ्य हो वे गंगोत्री जाकर गंगा स्नान करें और धन्यता तथा गौरव की अनुभूति करें, पर गंगा का पहला तत्व हरिद्वार है अर्थात जहाँ उनकी सुलभता का सुख है ।
गंगा तो गंगोत्री से निकलती है । ऐसी स्थिति में इस श्लोक में यह कहना चाहिए था कि गंगा का सर्वश्रेष्ठ तीर्थ गंगोत्री है, लेकिन गंगोत्री का महत्व अधिक है या हरिद्वार का ? वैसे तो जो लोग गंगोत्री की यात्रा करके आते हैं, उनको बड़ी धन्यता और गौरव की अनुभूति होती हैं । उसकी तुलना में हरिद्वार जाना सरल है, पर पुराणों या ऋषियों ने बड़ी अनोखी बात कही । उन्होंने गंगोत्री को बहुत कम महत्व दिया और हरिद्वार को बड़ा बता दिया । क्यों ? उन्होंने कहा कि दोनों में यह अन्तर हैं कि गंगा को गंगोत्री में पाने के लिए बड़ा कठिन परिश्रम करना पड़ता है । बड़ी कठिनाई से ऊपर चढ़ने पर वे प्राप्त होती हैं, लेकिन हरिद्वार में यह विशेषता है कि वहाँ गंगा स्वयं नीचे उतरकर आ जाती है और व्यक्ति को सुलभता से प्राप्त हो जाती हैं, किन्तु मनुष्य की एक बड़ी विचित्र भावना है कि जो वस्तु उसे कठिनाई से मिलती है उसी को वह अधिक महत्व देता है । इसलिए जिस तीर्थ की यात्रा जितनी ही कठिन है, उसे व्यक्ति उतना ही महत्व देता है । जिसकी यात्रा जिसकी यात्रा जितनी ही सुलभ है, उसे उतना ही कम महत्वपूर्ण मानता है, लेकिन शास्त्रकारों ने कहा कि जिनमें सामर्थ्य हो वे गंगोत्री जाकर गंगा स्नान करें और धन्यता तथा गौरव की अनुभूति करें, पर गंगा का पहला तत्व हरिद्वार है अर्थात जहाँ उनकी सुलभता का सुख है ।
Tuesday, 19 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........
गोस्वामीजी कहते हैं कि गंगा का जीवन-दर्शन हमारे लिए जीवन का आधार होना चाहिए । इसलिए जहाँ पर गंगा की महिमा बतायी गयी है, वहाँ पर एक सांकेतिक सूत्र भी दिया गया है । गंगा किनारे जितने गांव और शहर हैं, वे सभी तीर्थ हैं, लेकिन इनमें तीन तीर्थों का उल्लेख विशेष रूप से किया गया हैं और वे बड़े महत्व के हैं - हरिद्वारे प्रयागे च गंगासागरसंगमे - गंगा के किनारे हरिद्वार, प्रयाग और गंगासागर ये तीन सर्वश्रेष्ठ तीर्थ हैं । ऐसा कहकर अन्य तीर्थों की निन्दा नहीं की गयी है, बल्कि इन तीनों का चुनाव बड़े सांकेतिक रूप से किया गया है, क्योंकि गंगा हमारे लिए केवल एक नदी नहीं, अपितु हमारे समस्त धर्म और संस्कृति का जो तत्व है, हमारे जीवन-दर्शन का जो तत्व है, उन सबको हमारे ऋषियों ने उन्हीं के माध्यम से पुराणों में व्यक्त किया है । उसमें जो तीन स्थानों का प्रतीक चुना गया है, बड़े महत्व का है । पहला स्थान चुना गया हरिद्वार । एक सज्जन ने कहा कि ऋषि-मुनि बड़े कुशल वर्णनकर्ता थे । उन्होंने एक प्रकार से भौगोलिक वर्णन किया - हरिद्वार से प्रारंभ, प्रयाग मध्य और गंगासागर में समुद्र - मिलन पर समाप्ति, पर तत्त्वतः यह ठीक नहीं है, क्योंकि गंगा का उद्भव हरिद्वार से नहीं हुआ है । गंगा तो गंगोत्री से निकलती है ।
.....आगे कल .......
.....आगे कल .......
Monday, 18 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........
कीरति भनिति भूति भलि सोई।
सुरसरि सम सब कहँ हित होई।।
गोस्वामीजी ने कहा कि कीर्ति, कविता और सम्पत्ति तीनों वस्तुओं की श्रेष्ठता की एक ही कसौटी है कि उस वस्तु के द्वारा किसी एक व्यक्ति का हित होता है या सबका हित होता है। इसलिए उन्होंने इसके संदर्भ में गंगा का दृष्टांत दिया। गंगाजी की विलक्षणता यह है कि वे ऊपर से उतरकर नीचे आती हैं, पर उस नीचे आने का उद्देश्य क्या है ? जब गंगा ब्रह्मा के कमण्डलु में थीं, तब वे देवलोक में, ब्रह्मलोक में थी, लेकिन वे देवलोक से उतरकर मृत्युलोक में कैलाश पर्वत पर आ गयीं, फिर उतरकर हिमाचल की चोटियों पर आ गयीं और वहाँ से उतरकर पृथ्वी पर आ गयीं। इसके बाद पृथ्वी पर बहती हुई वे समुद्र की ओर जा रही हैं। इन सबके पीछे उनका क्या उद्देश्य है ? इसके पीछे उनका उद्देश्य यही है कि वे पापियों का उद्धार करने के लिए आती हैं, लोककल्याण के लिए अपने आपको नीचे उतारकर सबकी सेवा में लगा देती हैं। यही गंगाजी के अवतरण का उद्देश्य और उनका सबसे बड़ा गौरव है।
सुरसरि सम सब कहँ हित होई।।
गोस्वामीजी ने कहा कि कीर्ति, कविता और सम्पत्ति तीनों वस्तुओं की श्रेष्ठता की एक ही कसौटी है कि उस वस्तु के द्वारा किसी एक व्यक्ति का हित होता है या सबका हित होता है। इसलिए उन्होंने इसके संदर्भ में गंगा का दृष्टांत दिया। गंगाजी की विलक्षणता यह है कि वे ऊपर से उतरकर नीचे आती हैं, पर उस नीचे आने का उद्देश्य क्या है ? जब गंगा ब्रह्मा के कमण्डलु में थीं, तब वे देवलोक में, ब्रह्मलोक में थी, लेकिन वे देवलोक से उतरकर मृत्युलोक में कैलाश पर्वत पर आ गयीं, फिर उतरकर हिमाचल की चोटियों पर आ गयीं और वहाँ से उतरकर पृथ्वी पर आ गयीं। इसके बाद पृथ्वी पर बहती हुई वे समुद्र की ओर जा रही हैं। इन सबके पीछे उनका क्या उद्देश्य है ? इसके पीछे उनका उद्देश्य यही है कि वे पापियों का उद्धार करने के लिए आती हैं, लोककल्याण के लिए अपने आपको नीचे उतारकर सबकी सेवा में लगा देती हैं। यही गंगाजी के अवतरण का उद्देश्य और उनका सबसे बड़ा गौरव है।
Sunday, 17 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........
......कल से आगे......
यही जुगनू की मनोवृत्ति है कि जब कोई नहीं दिखाई देगा, तब हम दिखाई देंगे। इसका अभिप्राय यह है कि जब किसी की कीर्ति प्रकाशित होती है, (कीर्ति की तुलना प्रकाश से की जाती है ) तो वह निरन्तर यही चाहता है कि संसार में और सारे प्रकाश समाप्त हो जायें और केवल मैं चमकता रहूँ। वह नहीं चाहता कि किसी और की चमक बढ़े, क्योंकि उस चमक में मेरा महत्व, मेरी महिमा कम हो जायेगी। मानस में गोस्वामीजी कहते हैं कि कीर्ति का उद्देश्य अपने आपको चमकाना नहीं, बल्कि दूसरों को प्रकाश देना होना चाहिए और इसी तरह कविता की व्याख्या करते हैं कि कविता का उद्देश्य क्या होना चाहिए ? कविता का उद्देश्य होना चाहिए विश्व का हित। एक कवि यदि अपने काव्य का कौशल प्रदर्शित करके अपने को प्रतिष्ठित करना चाहता है, महिमा से मण्डित होना चाहता है, तो उस कविता के द्वारा उसके जीवन में कोई लाभ नहीं होगा। कविता का उद्देश्य तो यह होना चाहिए कि उससे दूसरे लोगों को भी प्रेरणा प्राप्त हो। जो कविता समाज का हित करे वही कविता है। इसी तरह गोस्वामीजी कहते हैं कि सम्पत्ति वह नहीं है जो अपने पास या बैंक के अपने खाते में जमा हो। सम्पत्ति तो वही है जिसका प्रयोग संसार के कल्याण के लिए, लोगों के कल्याण के लिए एवं जनसेवा के लिए हो।
यही जुगनू की मनोवृत्ति है कि जब कोई नहीं दिखाई देगा, तब हम दिखाई देंगे। इसका अभिप्राय यह है कि जब किसी की कीर्ति प्रकाशित होती है, (कीर्ति की तुलना प्रकाश से की जाती है ) तो वह निरन्तर यही चाहता है कि संसार में और सारे प्रकाश समाप्त हो जायें और केवल मैं चमकता रहूँ। वह नहीं चाहता कि किसी और की चमक बढ़े, क्योंकि उस चमक में मेरा महत्व, मेरी महिमा कम हो जायेगी। मानस में गोस्वामीजी कहते हैं कि कीर्ति का उद्देश्य अपने आपको चमकाना नहीं, बल्कि दूसरों को प्रकाश देना होना चाहिए और इसी तरह कविता की व्याख्या करते हैं कि कविता का उद्देश्य क्या होना चाहिए ? कविता का उद्देश्य होना चाहिए विश्व का हित। एक कवि यदि अपने काव्य का कौशल प्रदर्शित करके अपने को प्रतिष्ठित करना चाहता है, महिमा से मण्डित होना चाहता है, तो उस कविता के द्वारा उसके जीवन में कोई लाभ नहीं होगा। कविता का उद्देश्य तो यह होना चाहिए कि उससे दूसरे लोगों को भी प्रेरणा प्राप्त हो। जो कविता समाज का हित करे वही कविता है। इसी तरह गोस्वामीजी कहते हैं कि सम्पत्ति वह नहीं है जो अपने पास या बैंक के अपने खाते में जमा हो। सम्पत्ति तो वही है जिसका प्रयोग संसार के कल्याण के लिए, लोगों के कल्याण के लिए एवं जनसेवा के लिए हो।
Saturday, 16 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........
एक स्थान पर गोस्वामीजी कहते हैं - कविता, कीर्ति और सम्पत्ति वही कल्याणकारी है, जो गंगा के समान सबका हित करे। एक कीर्ति वह है जो केवल व्यक्ति को ही चमकाती है, अन्य लोगों की दृष्टि में एक व्यक्ति को उठा देती है। इसको यों कहें कि जैसे प्रकाश के दो रूप होते हैं। एक तो वह जिसके द्वारा व्यक्ति स्वयं चमके और दूसरा वह जिसके द्वारा व्यक्ति दूसरों को प्रकाश दे। इसको गोस्वामीजी ने दृष्टांत के रूप में कहा कि चमकने के लिए तो जुगनू भी चमकता है। लेकिन विडम्बना यह है कि उसमें चमक तो है, लेकिन वह गहरे अंधकार में ही व्यक्त होता है। इसलिए जुगनू की मनोवृत्ति क्या है ? एक बार ब्रह्मा ने पूछा कि तुम क्या चाहते हो ? तो उसने यही वर माँगा कि पहले सूर्य को अस्त कर दीजिए। सूर्य अस्त हो गया। रात्रि हो गयी तो चंद्रमा चमकने लगा। जुगनू ने दूसरी माँग की कि चंद्रमा भी अस्त हो जाये। रात भी रहे तो अँधेरी रात हो। अब सूर्य भी नहीं एवं चंद्रमा भी नहीं, पर आकाश में चमकने वाले अभी भी बहुत हैं। जुगनू को उनसे भी बड़ी ईर्ष्या हुई। उसने ब्रह्मा से प्रार्थना की कि ऐसा बादल छा जाये कि ये तारे भी न दिखाई दें ! क्यों ? यही जुगनू की मनोवृत्ति है कि जब कोई नहीं दिखाई देगा, तब हम दिखाई देंगे।
........आगे कल ......
........आगे कल ......
Friday, 15 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........
हमारे सुख- दुःख की परिभाषा क्या है ? जिसके साथ हमारा अपनापन जुड़ा हुआ है, उनके सुख में, उनकी उन्नति में हमें प्रसन्नता होती है और जिनके साथ हमारा अपनापन नहीं जुड़ा है, जिनको हम पराया समझ बैठे हैं, उन व्यक्तियों के सुख और उन्नति से हम प्रसन्न नहीं होते, अपितु ईर्ष्या होती है, दुःख होता है। अब इस दुःख के निराकरण का क्या उपाय है ? यह तो मनुष्य की स्वयं की वृत्ति है। वह अपने स्व को धीरे - धीरे इतना संकुचित करता चला जाता है कि अन्त में अपने आप मे सिमट कर रह जाता है। विश्व में अनेक देश का स्व, देश में प्रान्त का स्व, प्रान्त में जिले का, जिले में नगर का, नगर में जाति, जाति में परिवार और परिवार में भी उसका अपना स्व। इस तरह वह अपने स्व को अत्यंत क्षुद्र बना लेता है। ज्यों-ज्यों व्यक्ति का स्व क्षुद्र होता जायेगा, त्यों-त्यों उसके जीवन में दुःख की मात्रा बढ़ती जायेगी और जिस व्यक्ति के जीवन में उसके स्व का जितना ही अधिक विस्तार है, वह उतना ही अपने व्यक्तिगत सुख-दुःख से ऊपर उठ जाता है। वह दूसरों के सुख और उन्नति में ही अपने सुख तथा उन्नति का अनुभव करता है और प्रसन्न होता है
Thursday, 14 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्........
स्वभावजन्य दुःख को सुख में बदलने की चेष्टा हम कैसे करें ? इसके लिए रामायण में एक बड़ी सांकेतिक भाषा का प्रयोग किया गया है। वह यह है कि दुःख लोहे की तरह है, लेकिन जो इस लोहे को सोने के रूप में परिणत करना जानता है उसके लिए लोहा भी बहुमूल्य हो जाता है। दुःख का लोहा सुख के सोने के रूप में बदल सकें, इसकी प्रक्रिया क्या है ? यहाँ पर एक सूत्र दे दिया गया है कि जो व्यक्ति सबका हित चाहता है, सबकी उन्नति चाहता है, उस व्यक्ति के जीवन में भला दुःख कैसे हो सकता है ? जिसके पास पारस है उसके पास लोहा लोहा नहीं है, वह तो लोहे को सोना बना लेता है। इसका तात्पर्य क्या है ? इसका सीधा-सा तात्पर्य यह है कि भाई ! जो दूसरों के दुःख से दुखी होता है, वह स्वाभाविक रूप से ही दूसरों के सुख से सुखी होगा। जहाँ ऐसी वृत्ति होगी, वहाँ स्वयं का कोई सुख-दुःख होगा नहीं। जिस व्यक्ति का स्व इतना फैल गया हो, उसके जीवन में भला व्यक्तिगत सुख-दुःख का क्या स्थान हो सकता है ?
Wednesday, 13 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........
दुःख का जो चौथा कारण है, वह दुःख को घटाने और बढ़ाने का सबसे बड़ा साधन है। व्यक्ति के स्वभाव को गोस्वामीजी दुःख का चौथा कारण बताते हैं। अभिप्राय यह है कि जब कभी काल, कर्म अथवा गुण के द्वारा दुःख की सृष्टि होती है, तब उस दुःख को हम कैसे ग्रहण करते हैं, यह हमारे स्वभाव पर निर्भर करता है। इसे यों भी कह सकते हैं कि अन्ततोगत्वा हम अपने अन्तःकरण की जो वृत्ति बनाये हुए हैं, वह दुःखग्राही या सुखग्राही ? अब यह जो स्वभावजन्य दुःख है, यह तो हमारा अपना ही बनाया हुआ है, अतः इसका समाधान हमारे अपने हाथ में है। हम अपने स्वभाव को अगर बदल सकें, तो न केवल ये त्रिविध दुःख कम हो सकते हैं, अपितु इन्हें सुख में भी बदला जा सकता है। यदि हम सच्चे अर्थों में स्वभाव के निर्माण की प्रक्रिया जान लें और अपने स्वभाव को परिवर्तित कर सकें, तो काल, कर्म और गुण से उत्पन्न होने वाले दुःखों से हम उस तरह प्रभावित नहीं होंगे, जिस तरह कि साधारण व्यक्ति हुआ करते हैं।
Tuesday, 12 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........
दुःख का तीसरा कारण है गुण। सृष्टि की जो रचना हुई है, वह मिलावट से हुई है। मिलावटी धातुओं द्वारा वस्तुओं का निर्माण हुआ है। अब जिसका मूल उत्पादन ही शुद्ध नहीं है, तो उससे निर्मित वस्तु कैसे शुद्ध होगी ? मिलावट, गंदगी या मलिनता अगर बाहर से आया हुआ हो, तब तो उसकी सफाई की जा सकती है, लेकिन मलिनता अगर मूल वस्तु में ही विद्यमान हो, तो उसे किस तरह से दूर करेंगे ? ब्रह्मा या ईश्वर ने जब सृष्टि का निर्माण किया, तो सत्त्व, रज और तम इन तीनों धातुओं को मिलाकर ही सृष्टि का निर्माण किया और जब तीनों को मिलाकर सृष्टि का निर्माण हुआ, तब यह संभव नहीं है कि कोई वस्तु शुद्ध हो। कितनी भी चेष्टा क्यों न की जाय ! सत्त्व के साथ रज और तम तो रहेगा ही। इतना अवश्य है कि उसकी मात्रा में भेद हो सकता है। हम सब अपने जीवन में भी देखते हैं कि कभी तो व्यक्ति अन्तःकरण में बड़े उत्कृष्ट विचार उठते हैं, फिर कभी ऐसी स्थिति भी आती है, जब उसमें पुरुषार्थ की भावना जागृत होती है और कभी उसे थकान आ जाती है, नींद आने लगती है तथा वह सो जाता है। ये जो तीन प्रक्रियाएँ मनुष्य के जीवन में दिखाई देती हैं, ये तीनों त्रिगुण से संबद्ध है। इस प्रकार रचना के जो मूल तत्त्व त्रिगुण हैं, उनके द्वारा भी मनुष्य के जीवन में दुःख आता है।
Monday, 11 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........
दुःख का दूसरा कारण है कर्म। मनुष्य का जीवन इतना ही नहीं है, जितना वर्तमान में दिखाई दे रहा है। मनुष्य तो अगणित काल से विविध रूपों में जन्म लेता आ रहा है और उन जन्मों में उसके द्वारा न जाने कितने कर्म हुए हैं। इनमें से कुछ कर्म ऐसे हैं जिनका परिणाम व्यक्ति तुरन्त पा लेता है, पर कुछ कर्मों के परिणाम ऐसे भी हैं जो तत्काल नहीं मिलते। ऐसे परिणाम व्यक्ति के चित्त में संग्रहीत रहते हैं और यह संभव है कि जिन कर्मों के परिणाम हमें पूर्वजन्मों न मिले हों, वे इस जन्म में मिल रहे हैं।
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........
दुःख का दूसरा कारण है कर्म। मनुष्य का जीवन इतना ही नहीं है, जितना वर्तमान में दिखाई दे रहा है। मनुष्य तो अगणित काल से विविध रूपों में जन्म लेता आ रहा है और उन जन्मों में उसके द्वारा न जाने कितने कर्म हुए हैं। इनमें से कुछ कर्म ऐसे हैं जिनका परिणाम व्यक्ति तुरन्त पा लेता है, पर कुछ कर्मों के परिणाम ऐसे भी हैं जो तत्काल नहीं मिलते। ऐसे परिणाम व्यक्ति के चित्त में संग्रहीत रहते हैं और यह संभव है कि जिन कर्मों के परिणाम हमें पूर्वजन्मों न मिले हों, वे इस जन्म में मिल रहे हैं।
Sunday, 10 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........
कुछ दुःख तो व्यक्ति के जीवन में काल के कारण आते हैं। कालचक्र निरन्तर चलता रहता है। यह काल की प्रकृति है। इस कालचक्र में सुख-दुःख, जय-पराजय आदि का आना अवश्सम्भावी है। कालजन्य दुःख में जो प्रक्रिया दिखाई देती है, उसमें किसी व्यक्ति का हाथ नहीं है। वह किसी व्यक्ति के वश में नहीं है। काल का निर्माता व्यक्ति नहीं है। चाहें तो ईश्वर को ही कालस्वरूप कह लीजिए या कहें कि काल ईश्वर के द्वारा संचालित है। यहीं पर व्यक्ति के पुरुषार्थ की सीमा समाप्त हो जाती है।
Saturday, 9 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........
मानव जीवन की सबसे बड़ी समस्या है दुःख। यह दुःख मनुष्य के जीवन में अगणित रूपों में आता है। इस दुःख की व्यापकता को देखते हुए ही गीता में इस संसार को दु:खालयमशाश्वतम् कहा गया है, किन्तु व्यक्ति इस दुःख की समस्या का समाधान पाना चाहता है, इसका निराकरण करना चाहता है। अनेक संप्रदाय, संस्थाएँ तथा महापुरुष इस दुःख की समस्या के भिन्न-भिन्न समाधान देने का प्रयास करते हैं। रामचरितमानस में रामराज्य रूपी जो व्यावहारिक लक्ष्य प्रस्तुत किया गया है, उसकी यही विशेषता बताई गयी है कि रामराज्य में कोई दुःख नहीं है और उसका स्पष्टीकरण देते हुए यह भी बता दिया कि दुःख व्यक्ति के जीवन में किन-किन रूपों में आता है। रामराज्य के संदर्भ में दुःखों का जो विभाजन किया गया है, उसकी चर्चा आने वाले दिनों में करेंगे।
Friday, 8 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........
सबसे विचित्र दुःख है - स्वभावजन्य दुःख। यह कौन सा रोग है ? गोस्वामीजी मानस रोग के संदर्भ में कहते हैं - दूसरे का सुख देखकर जलना ही क्षय रोग है। बड़ी विचित्र बात है। यह कौन सा दुःख है ? काल का, कर्म का या गुण का ? नहीं यह स्वभाव का दुःख है। व्यक्ति का स्वभाव ही ऐसा बन गया है। यह काल, कर्म, गुण का नहीं बल्कि व्यक्ति का अपना रचा हुआ दुःख है। किसी वस्तु की कमी नहीं है, पर दूसरों का सुख देखकर जलन हो रही है। जलने का स्वभाव ही बना लिया है। अर्थात बिना कारण का दुःख। हमें भोजन न मिले तो हम दुखी हों, पर दूसरों को भोजन करते देखकर हम दुखी हो जायँ, हमारे पास वस्त्र न हो तो हम दुखी हों, यह तो समझ में आता है, पर हमारे पास अभाव न हो तो भी दूसरों के वस्त्र देखकर हम दुखी हो जायँ। यह क्या है ? यह स्वभावजन्य दुःख है, जिस दुःख में कोई बाध्यता नहीं है, काल, कर्म और गुण में तो कुछ बाध्यताएँ हैं और उन बाध्यताओं के कारण हमें उन दुःखों को किसी न किसी रूप में स्वीकार करना पड़ता है, पर स्वभावकृत जो दुःख है, वह तो अपना बनाया हुआ दुःख है। और इसका अभिप्राय यह है कि अपने ही कुपथ्य से जो रोग हुआ है, अपनी ही भूल से हम जो दुःख पा रहे हैं, वह तो अपना ही बनाया हुआ दुःख है, रोग है।
Thursday, 7 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........
दुःख का तीसरा प्रकार है - गुणजन्य दुःख। गुण वे हैं, जिनसे हमारा निर्माण हुआ है। सत्त्व, रज और तम- ये तीनों गुण हममें विद्यमान हैं। इनसे उत्पन्न होने वाली समस्याओं का समाधान यह है कि यदि हम गुणों का सदुपयोग करना सीख लें, तो गुणजन्य दुःखों से हम बच सकते हैं। तमोगुण के कारण नींद आती है, रजोगुण के कारण कर्म होते हैं, सत्त्वगुण के द्वारा विचार होता है। तीनों बहुत अच्छे हैं, बशर्ते हम तीनों का उचित समय पर सदुपयोग करें, विचार के समय विचार करें, पर जब हमें कर्म करना चाहिए, तब कहीं हम विचार करने बैठ जायँ, कर्मशूण्य हो जायँ, तब क्या होगा ? जब रजोगुण चाहिए तब सत्त्वगुण आ गया तो ? यह एक समस्या है। जिस समय आप कथा सुन रहे हैं, उस समय चाहिए सत्त्वगुण , पर उसी समय कई लोगों का तमोगुण प्रबल होने लगता है, नींद आने लगती है। जब कथा सुनकर लौटे किसी ने पूछ दिया कि क्या सुने ? बोले - भई ! क्या बताऊँ, कथा में नींद आ गयी। इस तरह गुण समस्या भी बन सकते हैं। तीनों गुण तो रहेंगे ही, उनका जीवन में प्रभाव तो होगा ही, नींद भी आयेगी, कर्म भी होगा, विचार भी होगा, पर यदि हम इन्हें सही दिशा में मोड़कर इनका सदुपयोग कर लें तो इन गुणजन्य समस्याओं का समाधान हम अपने जीवन में पा लेंगे।
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........
दुःख का तीसरा प्रकार है - गुणजन्य दुःख। गुण वे हैं, जिनसे हमारा निर्माण हुआ है। सत्त्व, रज और तम- ये तीनों गुण हममें विद्यमान हैं। इनसे उत्पन्न होने वाली समस्याओं का समाधान यह है कि यदि हम गुणों का सदुपयोग करना सीख लें, तो गुणजन्य दुःखों से हम बच सकते हैं। तमोगुण के कारण नींद आती है, रजोगुण के कारण कर्म होते हैं, सत्त्वगुण के द्वारा विचार होता है। तीनों बहुत अच्छे हैं, बशर्ते हम तीनों का उचित समय पर सदुपयोग करें, विचार के समय विचार करें, पर जब हमें कर्म करना चाहिए, तब कहीं हम विचार करने बैठ जायँ, कर्मशूण्य हो जायँ, तब क्या होगा ? जब रजोगुण चाहिए तब सत्त्वगुण आ गया तो ? यह एक समस्या है। जिस समय आप कथा सुन रहे हैं, उस समय चाहिए सत्त्वगुण , पर उसी समय कई लोगों का तमोगुण प्रबल होने लगता है, नींद आने लगती है। जब कथा सुनकर लौटे किसी ने पूछ दिया कि क्या सुने ? बोले - भई ! क्या बताऊँ, कथा में नींद आ गयी। इस तरह गुण समस्या भी बन सकते हैं। तीनों गुण तो रहेंगे ही, उनका जीवन में प्रभाव तो होगा ही, नींद भी आयेगी, कर्म भी होगा, विचार भी होगा, पर यदि हम इन्हें सही दिशा में मोड़कर इनका सदुपयोग कर लें तो इन गुणजन्य समस्याओं का समाधान हम अपने जीवन में पा लेंगे।
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........
दुःख का तीसरा प्रकार है - गुणजन्य दुःख। गुण वे हैं, जिनसे हमारा निर्माण हुआ है। सत्त्व, रज और तम- ये तीनों गुण हममें विद्यमान हैं। इनसे उत्पन्न होने वाली समस्याओं का समाधान यह है कि यदि हम गुणों का सदुपयोग करना सीख लें, तो गुणजन्य दुःखों से हम बच सकते हैं। तमोगुण के कारण नींद आती है, रजोगुण के कारण कर्म होते हैं, सत्त्वगुण के द्वारा विचार होता है। तीनों बहुत अच्छे हैं, बशर्ते हम तीनों का उचित समय पर सदुपयोग करें, विचार के समय विचार करें, पर जब हमें कर्म करना चाहिए, तब कहीं हम विचार करने बैठ जायँ, कर्मशूण्य हो जायँ, तब क्या होगा ? जब रजोगुण चाहिए तब सत्त्वगुण आ गया तो ? यह एक समस्या है। जिस समय आप कथा सुन रहे हैं, उस समय चाहिए सत्त्वगुण , पर उसी समय कई लोगों का तमोगुण प्रबल होने लगता है, नींद आने लगती है। जब कथा सुनकर लौटे किसी ने पूछ दिया कि क्या सुने ? बोले - भई ! क्या बताऊँ, कथा में नींद आ गयी। इस तरह गुण समस्या भी बन सकते हैं। तीनों गुण तो रहेंगे ही, उनका जीवन में प्रभाव तो होगा ही, नींद भी आयेगी, कर्म भी होगा, विचार भी होगा, पर यदि हम इन्हें सही दिशा में मोड़कर इनका सदुपयोग कर लें तो इन गुणजन्य समस्याओं का समाधान हम अपने जीवन में पा लेंगे।
Wednesday, 6 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........
दुःख का दूसरा प्रकार है - कर्मजन्य दुःख। जो भी कर्म हम करते हैं उसका परिणाम हमें सुख और दुःख के रूप में भोगना पड़ता है। कुछ कर्मफल तो ऐसे हैं जो हमारे इसी जन्म के कर्मजन्य हैं और कुछ कर्मफल हमें ऐसे भी भोगने पड़ते हैं जिनका कर्म इस जीवन में दिखाई नहीं देता, तब कहना पड़ता है कि यह हमारे पूर्वजन्मों में किये गये कर्मों का फल है। इसे प्रारब्ध कहा जाता है। पूर्वजन्मों के प्रारब्ध को टाला नहीं जा सकता और इस जन्म में भी जाने-अनजाने जो कर्म हो चुके हैं उनका फल भी अनिवार्य है, उन्हें भी भोगना पड़ेगा, पर इन कर्मजन्य दुःखों से से बचने का एक सुन्दर उपाय है, क्या ? यज्ञभावना के द्वारा, जैसे उपवास। अनाहार की स्थिति दो प्रकार से आती है - एक तो अभावजन्य और दूसरी उपवास के कारण। भोजन के अभाव में व्यक्ति को अगर एक दिन भी निराहार रहना पड़े तो वह बैचेन हो उठता है, पर एकादशी या अन्य किसी उपवास के दिन वह स्वेच्छा से निराहार रहता है। भोजन का अभाव दोनों में है, पर उपवास में तपस्या की भावना है। अभाव में भी उसे सुख की अनुभूति होती है। व्यक्ति यदि यह भावना करे कि उसके द्वारा हम पाप से मुक्त हो रहे हैं, तब वे दुःख उसके जीवन में दुःख के स्थान पर तप बन जाते हैं। जैसे तप में हमें सुख और प्रसन्नता होती है, उसी तरह कर्मजन्य दुःख को भी हम तप की भावना से लें, तो उन दुःखों को जीत सकते हैं।
Tuesday, 5 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.......
बालि ने भगवान को कैसे बाँध लिया ? विभिषणजी ने भगवान से पूछा था कि महाराज ! आपको बाँधने का उपाय क्या है ? भगवान बोले कि रस्सी तो तुम्हारे पास ही है। उससे जो दूसरों को बाँधे हो, उन्हें छोड़कर मुझे बाँध लो - ममता के धागों को संसार से निकालकर मेरे पैरों में कसकर बाँध दो। ज्ञानी तो ममता का त्याग करता है और भक्त अपनी ममता को भगवान के पैरों में पिरो देता है। बालि में अपने शरीर के प्रति जो अहंता थी, उसे तो उन्होंने भगवान के चरणों में अर्पित कर ही दिया और ममता का जो केन्द्र था - पुत्र। मेरा पुत्र! उस अंगद को भी बुलाया और उसका हाथ पकड़कर भगवान के हाथों में दे दिया। कहा कि प्रभो ! अब आप जरा अंगद का हाथ पकड़ लीजिए। परिणाम क्या हुआ ? अहंता प्रभु के चरणों में और ममता हाथों में। इस प्रकार बालि अहंता और ममता से मुक्त हो गया। भगवान ने उसकी अहंता और ममता को स्वीकार कर लिया। अंगद को उन्होंने अपने पुत्र के रूप में स्वीकार कर लिया। काल एक ध्रुव सत्य है, अपरिहार्य है। इस कालजन्य दुःख पर हम चाहे तो बालि और जटायु की तरह विवेक के माध्यम से विजय प्राप्त कर सकते हैं।
Monday, 4 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........
बालि का देहाभिमान मिट गया। उसकी देह के प्रति ममता मिट गयी। अहंता और ममता दोनों मिट गये, यही मुक्ति का सच्चा स्वरूप है, लेकिन बालि तो इस मुक्ति से भी आगे बढ़ गया। बड़ी अनोखी बात है। अमरता का क्या अर्थ है ? देह के प्रति अहंता और ममता ही तो मृत्यु है। जो इन दोनों से मुक्त हो गया, वह मृत्यु से भी मुक्त हो गया, अमर हो गया। बालि तो मुक्त हो ही गया, पर साथ ही उसने भगवान को बाँध लिया। भक्ति की यही विलक्षणता है। ज्ञानी भी मुक्त होता है पर भक्त की विशेषता यह है कि वह स्वयं मुक्त होने के साथ-साथ भगवान को बाँध भी लेता है।
Sunday, 3 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........
बड़ी सुन्दर बात कही बालि ने। शरीर और आत्मा की बात है। शरीर का क्या महत्व है ? जैसे हम एक छोटा सा पौधा लगाते हैं, तो उसकी रक्षा के लिए उसके चारों ओर बाड़ भी लगा देते हैं और जब वह पौधा बढ़कर बड़ा वृक्ष हो जाता है, तब उसे बाड़ की आवश्यकता नहीं रह जाती, लेकिन कोई ऐसा बुद्धिमान व्यक्ति निकल आये, जो उस पौधे के बड़े हो जाने पर भी, वृक्ष हो जाने पर भी, उसके चारों ओर बाड़ लगाने की चेष्टा करे और बाड़ लगाने के लिए उसी वृक्ष की डाली को काट डाले, तो उससे बढ़कर मूर्ख कौन होगा ? शरीर क्या है ? काँटे की बाड़ ही तो है और उस काँटे की बाड़ में आत्मतत्व का पौधा है। उसके भीतर वह सुरक्षित है। ज्ञान - वैराग्य सुरक्षित है। अब आप जो इस शरीर को सुरक्षित रखने की बात कहते हैं, तो इसका तो यही अर्थ होगा कि जिस काँटेदार बबूल के वृक्ष को काटकर मैंने इस कल्पतरु की रक्षा के लिए बाड़ बनाया, उसी आत्मतत्व रूपी कल्पतरु को काटकर अब मैं बबूल के लिए बाड़ बनाऊँ। यह तो आपकी प्रसन्नता के लक्षण नहीं हैं।
Saturday, 2 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........
भगवान ने बालि के सामने प्रस्ताव रखा- अचल करौं। बालि मैं चाहता हूँ कि तुम जीवित रहो। ये दूसरे पात्र हैं जिनसे भगवान ने जीवित रहने का अनुरोध किया। इसके पहले उन्होंने गीधराज से भी यही कहा था। बालि से जब कहा, तब तक बालि की इतनी अधिक उन्नति हो चुकी थी, वे इतना अधिक आगे बढ़ चुके थे कि न तो उन्हें ज्ञान की दृष्टि से जीवित रहना उचित लगा और न ही भक्ति की दृष्टि से। भक्ति की दृष्टि से उनके मन में यह बात आयी कि प्रभु प्रतिज्ञा कर चुके हैं मुझे मारने की। यह उनका ही संकल्प है। अवश्य ही मेरे कल्याण के लिए उन्होंने ऐसा संकल्प किया है और यदि मैं जीवित रहना चाहूँगा तो प्रभु की प्रतिज्ञा झूठी हो जायेगी। उनका संकल्प असत्य हो जायेगा। जीवित रहने की इच्छा प्रभु की इच्छा के विपरीत है। इसलिए उन्होंने प्रभु के प्रस्ताव को नम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया, लेकिन इससे भी बड़ी बात तो यह हुई कि बालि के जीवन में तत्वज्ञान का उदय हो गया है। भगवान कहते हैं कि बालि ! मैं तुम्हें नहीं, तुम्हारे अभिमान को मारना चाहता था। वह मर गया। अब मैं चाहता हूँ कि तुम जीवित रहो। मैं तुम्हें जीवन प्रदान करने के लिए प्रस्तुत हूँ। बालि तुरन्त बोले कि प्रभो ! क्या आप मुझ पर प्रसन्न नहीं है ? क्यों ? अगर आप मुझ पर प्रसन्न होते तो यह न कहते कि तुम जीवित रहो। बालि की दृष्टि कितनी बदल चुकी है। हममें से अगर किसी से भगवान पूछ दें कि क्या मैं तुम्हें अमर बना दूँ? तो कैसा लगेगा? लोग गदगद हो जायेंगे कि बस महाराज ! इससे बढ़िया बात और क्या होगी। पर बालि के जीवन में कितना विकास हो चुका है ? कहते हैं - प्रभो ! क्या आप समझते हैं कि अभी भी मेरा देहाभिमान बना हुआ है ? क्या अब भी मैं इस देह को आत्मा मानकर इसे बचाने की चेष्टा करूँगा।
Friday, 1 January 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........
भगवान के बाण से बालि ज्यों ही गिरा, भगवान राघवेन्द्र तुरंत उसके सामने प्रकट हो गये। वह भगवान से बोला - आपके सामने मेरी वाक्-चातुरी तो चल नहीं सकती, परन्तु प्रभो ! मैं आपसे एक ही बात पूछना चाहता हूँ कि प्रभु अजहूँ - अजहूँ माने आज तक, जब तक आप नहीं थे, तब तक मैंने जो पाप किये, उसका दण्ड तो आपने मुझे दिया, मुझे पापी माना, यहाँ तक तो ठीक है, पर अब जब आप मेरे सामने खड़े हैं और मैं आपका दर्शन कर रहा हूँ, तब आप बताइए कि अब मैं पापी हूँ या नहीं ? सुनकर भगवान मुस्कराये और बालि के शिर पर हाथ रख दिया। भक्तों के भगवान जो कर्मों के परिणाम को भी क्षमा करने को प्रस्तुत हैं, जीव के ऊपर दया करके उसके अभिमान को नष्ट करके, उसके शिर पर हाथ रख देते हैं। इसका अभिप्राय यह है कि अखिलविरुध्दधर्माश्रय ईश्वर एक ओर कठोर बनकर पाप का संहार कर रहे हैं तो दूसरी ओर कोमल बनकर भक्त की रक्षा का व्रत लिए हुए हैं। वही हाथ जिसके द्वारा बाण चलाया गया था, अब बालि के मस्तक पर है।
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