Friday, 1 January 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........

भगवान के बाण से बालि ज्यों ही गिरा, भगवान राघवेन्द्र तुरंत उसके सामने प्रकट हो गये। वह भगवान से बोला - आपके सामने मेरी वाक्-चातुरी तो चल नहीं सकती, परन्तु प्रभो ! मैं आपसे एक ही बात पूछना चाहता हूँ कि प्रभु अजहूँ - अजहूँ माने आज तक, जब तक आप नहीं थे, तब तक मैंने जो पाप किये, उसका दण्ड तो आपने मुझे दिया, मुझे पापी माना, यहाँ तक तो ठीक है, पर अब जब आप मेरे सामने खड़े हैं और मैं आपका दर्शन कर रहा हूँ, तब आप बताइए कि अब मैं पापी हूँ या नहीं ? सुनकर भगवान मुस्कराये और बालि के शिर पर हाथ रख दिया। भक्तों के भगवान जो कर्मों के परिणाम को भी क्षमा करने को प्रस्तुत हैं, जीव के ऊपर दया करके उसके अभिमान को नष्ट करके, उसके शिर पर हाथ रख देते हैं। इसका अभिप्राय यह है कि अखिलविरुध्दधर्माश्रय ईश्वर एक ओर कठोर बनकर पाप का संहार कर रहे हैं तो दूसरी ओर कोमल बनकर भक्त की रक्षा का व्रत लिए हुए हैं। वही हाथ जिसके द्वारा बाण चलाया गया था, अब बालि के मस्तक पर है।

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