मानव जीवन की सबसे बड़ी समस्या है दुःख। यह दुःख मनुष्य के जीवन में अगणित रूपों में आता है। इस दुःख की व्यापकता को देखते हुए ही गीता में इस संसार को दु:खालयमशाश्वतम् कहा गया है, किन्तु व्यक्ति इस दुःख की समस्या का समाधान पाना चाहता है, इसका निराकरण करना चाहता है। अनेक संप्रदाय, संस्थाएँ तथा महापुरुष इस दुःख की समस्या के भिन्न-भिन्न समाधान देने का प्रयास करते हैं। रामचरितमानस में रामराज्य रूपी जो व्यावहारिक लक्ष्य प्रस्तुत किया गया है, उसकी यही विशेषता बताई गयी है कि रामराज्य में कोई दुःख नहीं है और उसका स्पष्टीकरण देते हुए यह भी बता दिया कि दुःख व्यक्ति के जीवन में किन-किन रूपों में आता है। रामराज्य के संदर्भ में दुःखों का जो विभाजन किया गया है, उसकी चर्चा आने वाले दिनों में करेंगे।
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