Wednesday, 27 January 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ...........

दुख भगवान राम के भी जीवन में आते हैं । भगवान् कृष्ण के जीवन में भी आते हैं । भगवान् श्रीरामकृष्णदेव की जीवनी पढ़िए तो उनके जीवन में भी पीड़ा का पक्ष है, लेकिन उस दुख और पीड़ा के संदर्भ में उनकी दृष्टि कौन सी है ? बस यही बड़े महत्व की बात है । विभिन्न रूपों में आये हुए दुख तो हैं, लेकिन उन दुःखों को हम अपने जीवन में स्वीकार कैसे करें ? या हमारे पास कौन सी कला है, जिससे हम अपने जीवन में आये हुए दुःखों को सुखों में बदल दें; अथवा वह कौन सा पारस है हमारे पास, जिसके स्पर्श से दुखरूपी लोहा सुखरूपी सोना हो जाय ? गोस्वामीजी कहते हैं - जिसने सबके हित में अपना हित मान लिया हैंं,  उसे क्या कभी दुख हो सकता है ? अपने स्व का विस्तार करके सबमें अपने को ही देखिए । और तब मानो पारस के स्पर्श से दुखरूपी लोहा भी व्यक्ति के जीवन में सुखरूपी सोना हो जाता है । यह संकेत अयोध्याकाण्ड में है ।

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