Saturday, 2 January 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........

भगवान ने बालि के सामने प्रस्ताव रखा- अचल करौं। बालि मैं चाहता हूँ कि तुम जीवित रहो। ये दूसरे पात्र हैं जिनसे भगवान ने जीवित रहने का अनुरोध किया। इसके पहले उन्होंने गीधराज से भी यही कहा था। बालि से जब कहा, तब तक बालि की इतनी अधिक उन्नति हो चुकी थी, वे इतना अधिक आगे बढ़ चुके थे कि न तो उन्हें ज्ञान की दृष्टि से जीवित रहना उचित लगा और न ही भक्ति की दृष्टि से। भक्ति की दृष्टि से उनके मन में यह बात आयी कि प्रभु प्रतिज्ञा कर चुके हैं मुझे मारने की। यह उनका ही संकल्प है। अवश्य ही मेरे कल्याण के लिए उन्होंने ऐसा संकल्प किया है और यदि मैं जीवित रहना चाहूँगा तो प्रभु की प्रतिज्ञा झूठी हो जायेगी। उनका संकल्प असत्य हो जायेगा। जीवित रहने की इच्छा प्रभु की इच्छा के विपरीत है। इसलिए उन्होंने प्रभु के प्रस्ताव को नम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया, लेकिन इससे भी बड़ी बात तो यह हुई कि बालि के जीवन में तत्वज्ञान का उदय हो गया है। भगवान कहते हैं कि बालि ! मैं तुम्हें नहीं, तुम्हारे अभिमान को मारना चाहता था। वह मर गया। अब मैं चाहता हूँ कि तुम जीवित रहो। मैं तुम्हें जीवन प्रदान करने के लिए प्रस्तुत हूँ।  बालि तुरन्त बोले कि प्रभो ! क्या आप मुझ पर प्रसन्न नहीं है ? क्यों ? अगर आप मुझ पर प्रसन्न होते तो यह न कहते कि तुम जीवित रहो। बालि की दृष्टि कितनी बदल चुकी है। हममें से अगर किसी से भगवान पूछ दें कि क्या मैं तुम्हें अमर बना दूँ? तो कैसा लगेगा? लोग गदगद हो जायेंगे कि बस महाराज ! इससे बढ़िया बात और क्या होगी। पर बालि के जीवन में कितना विकास हो चुका है ? कहते हैं - प्रभो ! क्या आप समझते हैं कि अभी भी मेरा देहाभिमान बना हुआ है ? क्या अब भी मैं इस देह को आत्मा मानकर इसे बचाने की चेष्टा करूँगा।

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