Friday, 22 January 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

हरिद्वार के बाद है प्रयाग । बड़ा अनोखा संकेत है । प्रयाग में गंगा और यमुना का संगम होता है और कैसा सुंदर मिलन ? गंगा बाँहें फैलाकर यमुना को अपने में समेट लेती हैं । यमुना देखने में साँवली हैं, लेकिन वहाँ पर अपने को समेटकर, अपना रूप दे देने में, अपना नाम दे देने में, इस तरह धन्य बना देने में मानो समन्वय का सूत्र हैंं । गंगा-यमुना का संगम समन्वय का सूत्र देता हैंं । हरिद्वार में पहला सूत्र हैंं सुलभता और प्रयाग में दूसरा सूत्र हैंं समन्वय । गंगा सुलभ बनी और यमुना ने समन्वय को स्वीकार करते हुए गंगा में अपने आपको विलीन कर दिया । कोई कह सकता हैंं कि गंगा तो पूरी स्वार्थी निकलीं । बेचारी यमुना की पहले एक अलग पहचान तो थी । गंगा ने उसे अपने में विलीन कर लिया, तो उसका नाम भी विलीन हो गया और रूप भी । इस विलय के बाद सब उन्हें गंगा ही तो कहते हैं, यमुना कौन कहता है ? बेचारी यमुना तो घाटे में रही, लेकिन आप जरा विचार करके देखिए कि यमुना को अपने में लीन करने के बाद गंगा ने क्या किया ? क्या वे प्रयाग में ही रुक गयीं ? नहीं ! वे आगे बढ़ती जा रही हैं । कहां जा रही हैं ? समुद्र में अपने आपको विलीन कर देने के लिए ।

No comments:

Post a Comment