Sunday, 3 January 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........

बड़ी सुन्दर बात कही बालि ने। शरीर और आत्मा की बात है। शरीर का क्या महत्व है ? जैसे हम एक छोटा सा पौधा लगाते हैं, तो उसकी रक्षा के लिए उसके चारों ओर बाड़ भी लगा देते हैं और जब वह पौधा बढ़कर बड़ा वृक्ष हो जाता है, तब उसे बाड़ की आवश्यकता नहीं रह जाती, लेकिन कोई ऐसा बुद्धिमान व्यक्ति निकल आये, जो उस पौधे के बड़े हो जाने पर भी, वृक्ष हो जाने पर भी, उसके चारों ओर बाड़ लगाने की चेष्टा करे और बाड़ लगाने के लिए उसी वृक्ष की डाली को काट डाले, तो उससे बढ़कर मूर्ख कौन होगा ? शरीर क्या है ? काँटे की बाड़ ही तो है और उस काँटे की बाड़ में आत्मतत्व का पौधा है। उसके भीतर वह सुरक्षित है। ज्ञान - वैराग्य सुरक्षित है। अब आप जो इस शरीर को सुरक्षित रखने की बात कहते हैं, तो इसका तो यही अर्थ होगा कि जिस काँटेदार बबूल के वृक्ष को काटकर मैंने इस कल्पतरु की रक्षा के लिए बाड़ बनाया, उसी आत्मतत्व रूपी कल्पतरु को काटकर अब मैं बबूल के लिए बाड़ बनाऊँ। यह तो आपकी प्रसन्नता के लक्षण नहीं हैं।

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