Tuesday, 26 January 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

आदर्श तो यही है कि व्यक्ति का विस्तार हो, वह सबमें अपने को ही देखने लगे, पर व्यक्ति ने इसके विपरीत अपने स्व को धीरे-धीरे समेट लिया है, अपने आप में सिमटकर समाज से अलग हो गया है और इस कारण वह अपने को नितान्त अकेला और असहाय अनुभव करता है । इसलिए वह निरन्तर अपने स्व के सुख के लिए दूसरों से सुख को छीनने की चेष्टा करता है, अपने अहं की तुष्टि के लिए दूसरों के अहं से टकराता है । दूसरों का सुख उसे नहीं सुहाता, क्योंकि वह सब अपने लिए चाहता है । उसमें किसी की भागीदारी उसे सहन नहीं होती और इसका परिणाम क्या होता है ? या तो समाज में परस्पर संघर्ष हो रहा है या ऐसा सौदा हो रहा है कि जिसमें व्यक्ति परस्पर एक दूसरे को ठगने की कोशिश कर रहे हैं, एक दूसरे को दोष दे रहे हैं, एक दूसरे की निन्दा कर रहे हैं । इस स्थिति का रामचरितमानस में बड़े सांकेतिक रूप से विश्लेषण किया गया है । आने वाले दिनों में इसकी चर्चा करेंगे ।

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