Thursday, 21 January 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

कविता भी हिमालय की तरह दुर्गम नहीं होना चाहिए । वह कविता जिसे केवल कवि ही समझे; कभी-कभी तो स्वयं कवि भी नहीं समझ पाते कि वे क्या कह रहे हैं और बेचारे सुनने वाले भी समझने के लिए व्यर्थ परिश्रम करते रहें, फिर भी कुछ रहस्य पल्ले न पड़े । काव्य की विशेषता यह होनी चाहिए कि वह ऊपर से नीचे उतरे। कीर्ति की विशेषता भी यही होनी चाहिए कि वह सुलभ हो और सम्पत्ति की भी विशेषता यही हो कि वह तिजोरी में बन्द ना रहे, बल्कि हरिद्वार की भूमि में उतरकर समाज की सेवा में उसका उपयोग हो, जैसे गंगा हिमालय गंगोत्री से उतरकर हरिद्वार में सबको सुलभ होती है।

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