बालि ने भगवान को कैसे बाँध लिया ? विभिषणजी ने भगवान से पूछा था कि महाराज ! आपको बाँधने का उपाय क्या है ? भगवान बोले कि रस्सी तो तुम्हारे पास ही है। उससे जो दूसरों को बाँधे हो, उन्हें छोड़कर मुझे बाँध लो - ममता के धागों को संसार से निकालकर मेरे पैरों में कसकर बाँध दो। ज्ञानी तो ममता का त्याग करता है और भक्त अपनी ममता को भगवान के पैरों में पिरो देता है। बालि में अपने शरीर के प्रति जो अहंता थी, उसे तो उन्होंने भगवान के चरणों में अर्पित कर ही दिया और ममता का जो केन्द्र था - पुत्र। मेरा पुत्र! उस अंगद को भी बुलाया और उसका हाथ पकड़कर भगवान के हाथों में दे दिया। कहा कि प्रभो ! अब आप जरा अंगद का हाथ पकड़ लीजिए। परिणाम क्या हुआ ? अहंता प्रभु के चरणों में और ममता हाथों में। इस प्रकार बालि अहंता और ममता से मुक्त हो गया। भगवान ने उसकी अहंता और ममता को स्वीकार कर लिया। अंगद को उन्होंने अपने पुत्र के रूप में स्वीकार कर लिया। काल एक ध्रुव सत्य है, अपरिहार्य है। इस कालजन्य दुःख पर हम चाहे तो बालि और जटायु की तरह विवेक के माध्यम से विजय प्राप्त कर सकते हैं।
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