दुःख का दूसरा कारण है कर्म। मनुष्य का जीवन इतना ही नहीं है, जितना वर्तमान में दिखाई दे रहा है। मनुष्य तो अगणित काल से विविध रूपों में जन्म लेता आ रहा है और उन जन्मों में उसके द्वारा न जाने कितने कर्म हुए हैं। इनमें से कुछ कर्म ऐसे हैं जिनका परिणाम व्यक्ति तुरन्त पा लेता है, पर कुछ कर्मों के परिणाम ऐसे भी हैं जो तत्काल नहीं मिलते। ऐसे परिणाम व्यक्ति के चित्त में संग्रहीत रहते हैं और यह संभव है कि जिन कर्मों के परिणाम हमें पूर्वजन्मों न मिले हों, वे इस जन्म में मिल रहे हैं।
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