दुःख का तीसरा प्रकार है - गुणजन्य दुःख। गुण वे हैं, जिनसे हमारा निर्माण हुआ है। सत्त्व, रज और तम- ये तीनों गुण हममें विद्यमान हैं। इनसे उत्पन्न होने वाली समस्याओं का समाधान यह है कि यदि हम गुणों का सदुपयोग करना सीख लें, तो गुणजन्य दुःखों से हम बच सकते हैं। तमोगुण के कारण नींद आती है, रजोगुण के कारण कर्म होते हैं, सत्त्वगुण के द्वारा विचार होता है। तीनों बहुत अच्छे हैं, बशर्ते हम तीनों का उचित समय पर सदुपयोग करें, विचार के समय विचार करें, पर जब हमें कर्म करना चाहिए, तब कहीं हम विचार करने बैठ जायँ, कर्मशूण्य हो जायँ, तब क्या होगा ? जब रजोगुण चाहिए तब सत्त्वगुण आ गया तो ? यह एक समस्या है। जिस समय आप कथा सुन रहे हैं, उस समय चाहिए सत्त्वगुण , पर उसी समय कई लोगों का तमोगुण प्रबल होने लगता है, नींद आने लगती है। जब कथा सुनकर लौटे किसी ने पूछ दिया कि क्या सुने ? बोले - भई ! क्या बताऊँ, कथा में नींद आ गयी। इस तरह गुण समस्या भी बन सकते हैं। तीनों गुण तो रहेंगे ही, उनका जीवन में प्रभाव तो होगा ही, नींद भी आयेगी, कर्म भी होगा, विचार भी होगा, पर यदि हम इन्हें सही दिशा में मोड़कर इनका सदुपयोग कर लें तो इन गुणजन्य समस्याओं का समाधान हम अपने जीवन में पा लेंगे।
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