Saturday, 16 January 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........

एक स्थान पर गोस्वामीजी कहते हैं - कविता, कीर्ति और सम्पत्ति वही कल्याणकारी है, जो गंगा के समान सबका हित करे। एक कीर्ति वह है जो केवल व्यक्ति को ही चमकाती है, अन्य लोगों की दृष्टि में एक व्यक्ति को उठा देती है। इसको यों कहें कि जैसे प्रकाश के दो रूप होते हैं। एक तो वह जिसके द्वारा व्यक्ति स्वयं चमके और दूसरा वह जिसके द्वारा व्यक्ति दूसरों को प्रकाश दे। इसको गोस्वामीजी ने दृष्टांत के रूप में कहा कि चमकने के लिए तो जुगनू भी चमकता है। लेकिन विडम्बना यह है कि उसमें चमक तो है, लेकिन वह गहरे अंधकार में ही व्यक्त होता है। इसलिए जुगनू की मनोवृत्ति क्या है ? एक बार ब्रह्मा ने पूछा कि तुम क्या चाहते हो ? तो उसने यही वर माँगा कि पहले सूर्य को अस्त कर दीजिए। सूर्य अस्त हो गया। रात्रि हो गयी तो चंद्रमा चमकने लगा। जुगनू ने दूसरी माँग की कि चंद्रमा भी अस्त हो जाये। रात भी रहे तो अँधेरी रात हो। अब सूर्य भी नहीं एवं चंद्रमा भी नहीं, पर आकाश में चमकने वाले अभी भी बहुत हैं। जुगनू को उनसे भी बड़ी ईर्ष्या हुई। उसने ब्रह्मा से प्रार्थना की कि ऐसा बादल छा जाये कि ये तारे भी न दिखाई दें ! क्यों ? यही जुगनू की मनोवृत्ति है कि जब कोई नहीं दिखाई देगा, तब हम दिखाई देंगे।
      ........आगे कल ......

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