Sunday, 24 January 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

गोस्वामीजी ने सूत्र दिया कि वही कविता है, वही सम्पत्ति और वही कीर्ति है जो सबका हित करती है । लेकिन एक अन्य पंक्ति में उन्होंने एक दूसरी ही बात कह दी, जो पढ़ने में बड़ी अटपटी लगती है । दोनों परस्पर विरोधी प्रतीत होती है । जब वे रामचरितमानस लिखने लगे तो किसी ने पूछ दिया कि आप इतना परिश्रम क्यों कर रहे हैं ? उन्होंने कहा - स्वान्तःसुखाय - मैं तो अपने अन्तःकरण को सुख देने के लिए रामकथा का वर्णन कर रहा हूँ । अब दोनों बातें परस्पर विरोधी प्रतीत होती हैं । पढ़कर भ्रम होता है कि गोस्वामीजी की रचना अपने सुख के लिए है या सबके हित के लिए ? पर यही तो जीवन दर्शन का सूत्र है । क्या ? स्व और सबका भेद मिट जाना । गोस्वामीजी के जीवन में जब स्व और सबका भेद मिट गया, तब वे कहीं पर "सब कर हित" लिखते हैं और कहीं पर स्वान्तःसुखाय । इन पंक्तियों को पढ़कर हमें भ्रम इसलिए होता है क्योंकि हमारे जीवन में यह स्व और सबका भेद बना हुआ है और यह भेद केवल भेद ही नहीं, बल्कि हमारे स्व और सब परस्पर विरोधी हो गये हैं । हमारे स्व के स्वार्थ, इच्छाओं और दूसरों के स्वार्थ एवं इच्छाओं के बीच परस्पर टकराहट हो रही हैं । हमें यही चिंता बनी रहती हैं कि और सब सुख का लाभ न ले लें । व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक न होकर एक दूसरे से पृथक होकर गये हैं ।

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