दुःख का दूसरा प्रकार है - कर्मजन्य दुःख। जो भी कर्म हम करते हैं उसका परिणाम हमें सुख और दुःख के रूप में भोगना पड़ता है। कुछ कर्मफल तो ऐसे हैं जो हमारे इसी जन्म के कर्मजन्य हैं और कुछ कर्मफल हमें ऐसे भी भोगने पड़ते हैं जिनका कर्म इस जीवन में दिखाई नहीं देता, तब कहना पड़ता है कि यह हमारे पूर्वजन्मों में किये गये कर्मों का फल है। इसे प्रारब्ध कहा जाता है। पूर्वजन्मों के प्रारब्ध को टाला नहीं जा सकता और इस जन्म में भी जाने-अनजाने जो कर्म हो चुके हैं उनका फल भी अनिवार्य है, उन्हें भी भोगना पड़ेगा, पर इन कर्मजन्य दुःखों से से बचने का एक सुन्दर उपाय है, क्या ? यज्ञभावना के द्वारा, जैसे उपवास। अनाहार की स्थिति दो प्रकार से आती है - एक तो अभावजन्य और दूसरी उपवास के कारण। भोजन के अभाव में व्यक्ति को अगर एक दिन भी निराहार रहना पड़े तो वह बैचेन हो उठता है, पर एकादशी या अन्य किसी उपवास के दिन वह स्वेच्छा से निराहार रहता है। भोजन का अभाव दोनों में है, पर उपवास में तपस्या की भावना है। अभाव में भी उसे सुख की अनुभूति होती है। व्यक्ति यदि यह भावना करे कि उसके द्वारा हम पाप से मुक्त हो रहे हैं, तब वे दुःख उसके जीवन में दुःख के स्थान पर तप बन जाते हैं। जैसे तप में हमें सुख और प्रसन्नता होती है, उसी तरह कर्मजन्य दुःख को भी हम तप की भावना से लें, तो उन दुःखों को जीत सकते हैं।
No comments:
Post a Comment