Monday, 25 January 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

गोस्वामीजी के स्वान्तःसुखाय कहने का अभिप्राय क्या है ? जब सच्चे अर्थों में स्व और सबका भेद मिट जायेगा, विरोध मिट जायेगा, जब स्व का सुख सबका हित और सबका हित स्व का सुख हो जायेगा, तब जीवन में समग्रता आयेगी । यही रामायण का जीवन दर्शन है । अभिप्राय यह है कि जब हम दूसरों के हित में अपना हित मानते हैं, प्रत्येक व्यक्ति को सुखी देखकर हमें प्रसन्नता होती है, तब सबका सुख हमारा और हमारा सुख सबका बन जाता हैं । हमारे स्व का इतना विस्तार हो जाता हैं कि सब हमारे अपने लगने लगते हैं और इससे हमारे सुख का विस्तार होता है और हम निरन्तर दूसरों को सुख पाते हुए देखकर प्रसन्न होते हैं । तब लगता है कि यह जो सबकी उन्नति है, विजय है, सुख है, वह सब मेरा ही है, मुझे ही प्राप्त हो रहा है, वह सबमें अपने को ही देखने लगता है ।

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