हमारे सुख- दुःख की परिभाषा क्या है ? जिसके साथ हमारा अपनापन जुड़ा हुआ है, उनके सुख में, उनकी उन्नति में हमें प्रसन्नता होती है और जिनके साथ हमारा अपनापन नहीं जुड़ा है, जिनको हम पराया समझ बैठे हैं, उन व्यक्तियों के सुख और उन्नति से हम प्रसन्न नहीं होते, अपितु ईर्ष्या होती है, दुःख होता है। अब इस दुःख के निराकरण का क्या उपाय है ? यह तो मनुष्य की स्वयं की वृत्ति है। वह अपने स्व को धीरे - धीरे इतना संकुचित करता चला जाता है कि अन्त में अपने आप मे सिमट कर रह जाता है। विश्व में अनेक देश का स्व, देश में प्रान्त का स्व, प्रान्त में जिले का, जिले में नगर का, नगर में जाति, जाति में परिवार और परिवार में भी उसका अपना स्व। इस तरह वह अपने स्व को अत्यंत क्षुद्र बना लेता है। ज्यों-ज्यों व्यक्ति का स्व क्षुद्र होता जायेगा, त्यों-त्यों उसके जीवन में दुःख की मात्रा बढ़ती जायेगी और जिस व्यक्ति के जीवन में उसके स्व का जितना ही अधिक विस्तार है, वह उतना ही अपने व्यक्तिगत सुख-दुःख से ऊपर उठ जाता है। वह दूसरों के सुख और उन्नति में ही अपने सुख तथा उन्नति का अनुभव करता है और प्रसन्न होता है
No comments:
Post a Comment