सबसे विचित्र दुःख है - स्वभावजन्य दुःख। यह कौन सा रोग है ? गोस्वामीजी मानस रोग के संदर्भ में कहते हैं - दूसरे का सुख देखकर जलना ही क्षय रोग है। बड़ी विचित्र बात है। यह कौन सा दुःख है ? काल का, कर्म का या गुण का ? नहीं यह स्वभाव का दुःख है। व्यक्ति का स्वभाव ही ऐसा बन गया है। यह काल, कर्म, गुण का नहीं बल्कि व्यक्ति का अपना रचा हुआ दुःख है। किसी वस्तु की कमी नहीं है, पर दूसरों का सुख देखकर जलन हो रही है। जलने का स्वभाव ही बना लिया है। अर्थात बिना कारण का दुःख। हमें भोजन न मिले तो हम दुखी हों, पर दूसरों को भोजन करते देखकर हम दुखी हो जायँ, हमारे पास वस्त्र न हो तो हम दुखी हों, यह तो समझ में आता है, पर हमारे पास अभाव न हो तो भी दूसरों के वस्त्र देखकर हम दुखी हो जायँ। यह क्या है ? यह स्वभावजन्य दुःख है, जिस दुःख में कोई बाध्यता नहीं है, काल, कर्म और गुण में तो कुछ बाध्यताएँ हैं और उन बाध्यताओं के कारण हमें उन दुःखों को किसी न किसी रूप में स्वीकार करना पड़ता है, पर स्वभावकृत जो दुःख है, वह तो अपना बनाया हुआ दुःख है। और इसका अभिप्राय यह है कि अपने ही कुपथ्य से जो रोग हुआ है, अपनी ही भूल से हम जो दुःख पा रहे हैं, वह तो अपना ही बनाया हुआ दुःख है, रोग है।
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