Tuesday, 12 January 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........

दुःख का तीसरा कारण है गुण। सृष्टि की जो रचना हुई है, वह मिलावट से हुई है। मिलावटी धातुओं द्वारा वस्तुओं का निर्माण हुआ है। अब जिसका मूल उत्पादन ही शुद्ध नहीं है, तो उससे निर्मित वस्तु कैसे शुद्ध होगी ? मिलावट, गंदगी या मलिनता अगर बाहर से आया हुआ हो, तब तो उसकी सफाई की जा सकती है, लेकिन मलिनता अगर मूल वस्तु में ही विद्यमान हो, तो उसे किस तरह से दूर करेंगे ? ब्रह्मा या ईश्वर ने जब सृष्टि का निर्माण किया, तो सत्त्व, रज और तम इन तीनों धातुओं को मिलाकर ही सृष्टि का निर्माण किया और जब तीनों को मिलाकर सृष्टि का निर्माण हुआ, तब यह संभव नहीं है कि कोई वस्तु शुद्ध हो। कितनी भी चेष्टा क्यों न की जाय ! सत्त्व के साथ रज और तम तो रहेगा ही। इतना अवश्य है कि उसकी मात्रा में भेद हो सकता है। हम सब अपने जीवन में भी देखते हैं कि कभी तो व्यक्ति अन्तःकरण में बड़े उत्कृष्ट विचार उठते हैं, फिर कभी ऐसी स्थिति भी आती है, जब उसमें पुरुषार्थ की भावना जागृत होती है और कभी उसे थकान आ जाती है, नींद आने लगती है तथा वह सो जाता है। ये जो तीन प्रक्रियाएँ मनुष्य के जीवन में दिखाई देती हैं, ये तीनों त्रिगुण से संबद्ध है। इस प्रकार रचना के जो मूल तत्त्व त्रिगुण हैं, उनके द्वारा भी मनुष्य के जीवन में दुःख आता है।

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