स्वभावजन्य दुःख को सुख में बदलने की चेष्टा हम कैसे करें ? इसके लिए रामायण में एक बड़ी सांकेतिक भाषा का प्रयोग किया गया है। वह यह है कि दुःख लोहे की तरह है, लेकिन जो इस लोहे को सोने के रूप में परिणत करना जानता है उसके लिए लोहा भी बहुमूल्य हो जाता है। दुःख का लोहा सुख के सोने के रूप में बदल सकें, इसकी प्रक्रिया क्या है ? यहाँ पर एक सूत्र दे दिया गया है कि जो व्यक्ति सबका हित चाहता है, सबकी उन्नति चाहता है, उस व्यक्ति के जीवन में भला दुःख कैसे हो सकता है ? जिसके पास पारस है उसके पास लोहा लोहा नहीं है, वह तो लोहे को सोना बना लेता है। इसका तात्पर्य क्या है ? इसका सीधा-सा तात्पर्य यह है कि भाई ! जो दूसरों के दुःख से दुखी होता है, वह स्वाभाविक रूप से ही दूसरों के सुख से सुखी होगा। जहाँ ऐसी वृत्ति होगी, वहाँ स्वयं का कोई सुख-दुःख होगा नहीं। जिस व्यक्ति का स्व इतना फैल गया हो, उसके जीवन में भला व्यक्तिगत सुख-दुःख का क्या स्थान हो सकता है ?
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