Saturday, 30 January 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ...........

....कल से आगे......
जब कोई व्यक्ति अकेले में भगवान के सामने बैठता है, तो कहता है - मैं बड़ा बुरा हूँ, बड़ा पापी हूँ, लेकिन यही बात कोई समाज में उसके लिए कह दे कि वह बड़ा बुरा और पापी है, तो फिर देखिए कि उसका सारा क्रोध कैसे वेग से निकलता है । शीशे के साथ एक बात जुड़ी हुई है कि हर व्यक्ति उसे पसन्द करता है, पर अकेले में, सार्वजनिक रूप से नहीं । इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अकेले में शीशा देखकर प्रसन्न होता है, लेकिन अगर कोई दूसरा कह दे कि जरा शीशे में अपना मुँह तो देखिए ! तो झगड़ा हुए बिना नहीं रहेगा । यह शीशे की बड़ी विचित्रता है । इसका अभिप्राय यह है कि हम अपने दोषों को, अपनी कमियों को जानना तो चाहते हैं, लेकिन अकेले में । हमीं देखें ! हमीं जाने ! कोई दूसरा न जान पाये । हमारे दोषों को जानकर कोई हमारी आलोचना करे, इससे हम बचना चाहते हैं, पर दशरथ जी धन्य हैं । उन्होंने साहस किया और यह साहस बड़े महत्व का हैंं । सब लोग एक स्वर में प्रशंसा कर रहे थे कि दशरथजी के समान महान और कोई नहीं है । तो उसी समय वे सभा में सबके सामने शीशा लेकर देखने लगे कि यह जो इतने मुखों से प्रशंसा हो रही है, उसमें सच्चाई कहां तक है ? कितनी सुंदर बात है ? एक तो सभा में और दूसरे सिंहासन पर ।

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