Sunday, 10 January 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........

कुछ दुःख तो व्यक्ति के जीवन में काल के कारण आते हैं। कालचक्र निरन्तर चलता रहता है। यह काल की प्रकृति है। इस कालचक्र में सुख-दुःख, जय-पराजय आदि का आना अवश्सम्भावी है। कालजन्य दुःख में जो प्रक्रिया दिखाई देती है, उसमें किसी व्यक्ति का हाथ नहीं है। वह किसी व्यक्ति के वश में नहीं है। काल का निर्माता व्यक्ति नहीं है। चाहें तो ईश्वर को ही कालस्वरूप कह लीजिए या कहें कि काल ईश्वर के द्वारा संचालित है। यहीं पर व्यक्ति के पुरुषार्थ की सीमा समाप्त हो जाती है।

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