Wednesday, 13 January 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........

दुःख का जो चौथा कारण है, वह दुःख को घटाने और बढ़ाने का सबसे बड़ा साधन है। व्यक्ति के स्वभाव को गोस्वामीजी दुःख का चौथा कारण बताते हैं। अभिप्राय यह है कि जब कभी काल, कर्म अथवा गुण के द्वारा दुःख की सृष्टि होती है, तब उस दुःख को हम कैसे ग्रहण करते हैं, यह हमारे स्वभाव पर निर्भर करता है। इसे यों भी कह सकते हैं कि अन्ततोगत्वा हम अपने अन्तःकरण की जो वृत्ति बनाये हुए हैं, वह दुःखग्राही या सुखग्राही ? अब यह जो स्वभावजन्य दुःख है, यह तो हमारा अपना ही बनाया हुआ है, अतः इसका समाधान हमारे अपने हाथ में है। हम अपने स्वभाव को अगर बदल सकें, तो न केवल ये त्रिविध दुःख कम हो सकते हैं, अपितु इन्हें सुख में भी बदला जा सकता है। यदि हम सच्चे अर्थों में स्वभाव के निर्माण की प्रक्रिया जान लें और अपने स्वभाव को परिवर्तित कर सकें, तो काल, कर्म और गुण से उत्पन्न होने वाले दुःखों से हम उस तरह प्रभावित नहीं होंगे, जिस तरह कि साधारण व्यक्ति हुआ करते हैं।

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