गोस्वामीजी एक चित्र प्रस्तुत करते हैं - महाराज दशरथ सिंहासन पर बैठे हुए हैं । यहीं से अयोध्याकाण्ड प्रारंभ होता है । महाराज दशरथ की सभा में चारों ओर लोग उनकी प्रशंसा कर रहे हैं और सबके मुख से यही वाक्य निकल रहा है- तीनों काल और तीनों लोक में जितने पुण्यात्मा हुए हैं, उनमें से कोई भी दशरथ के समान नहीं है और अगली पंक्ति में साधना की दृष्टि से बड़ी सांकेतिक भाषा का प्रयोग किया गया है । प्रशंसा का यह वाक्य जब महाराज दशरथ के कानों में पड़ा, तब उनके मन में क्या प्रतिक्रिया हुई ? बगल में शीशा रखा हुआ था । महाराज दशरथ ने वह शीशा उठा लिया और उसमें अपना मुँह देखने लगे । कई लोगों को विशेषकर आधुनिक राजकुल की परम्पराओं के संदर्भ में पढ़ने वालों को यह बड़ा अटपटा लगता है, किसी लेखक ने तो यहाँ तक लिख दिया कि बेचारे तुलसीराम को क्या पता था कि राजाओं की सभा कैसे होती है ? वे तो निरन्तर राजा-महाराओं से दूर रहे । अपनी कल्पना से ही उन्होंने ऐसी व्यर्थ और बेतुकी बात लिख दी । क्या कोई राजा सिंहासन पर बैठकर शीशा देखता है ? वह तो किसी एकान्त कमरे में शीशा देखकर आयेगा और सिंहासन पर बैठेगा । सभा में सबके सामने थोड़े ही शीशा देखने लगेगा, पर इस वाक्य के द्वारा गोस्वामीजी क्या बताना चाहते हैं ? यही कि अकेले में शीशा देखना तो सभी जानते हैं, पर सबके सामने शीशा देखना बड़ा कठिन काम है, साधक तो वही है, जो केवल एकान्त में ही नहीं, सबके सामने शीशा देखे । इसका अभिप्राय क्या है ?
......आगे कल ......
......आगे कल ......
No comments:
Post a Comment