गंगा का तीसरा तीर्थ गंगासागर समर्पण का तत्व है और इसका अभिप्राय है कि सुलभता और समन्वय (हरिद्वार और प्रयाग) के पश्चात जैसे गंगा अपने आपको समुद्र में विलीन करके, नाम और रूप को खोकर अपने व्यक्तित्व से पृथक हो जाती है, ठीक उसी प्रकार अपनी कीर्ति के द्वारा, अपनी सम्पत्ति के द्वारा, कविता के द्वारा लोगों के लिए सुलभ बनकर, समन्वय के द्वारा सबको अपने में आत्मसात करके अंत में स्वयं को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देना, अपना विलय कर देना- यही मानो गंगा का गंगासागर में विलीन हो जाना है ।
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