Thursday, 31 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भगवान शंकर शिर को बदल देने की कला में बड़े निपुण हैं, लेकिन रावण के साथ उन्होंने ऐसा नहीं किया । रावण ने शंकरजी के सामने अपना शिर स्वयं काट दिया । क्यों ? उसने सोचा - इससे शिवजी प्रसन्न हो जायेंगे । भगवान शंकर ने कहा - अच्छा ! तुम्हारा शिर फिर से निकल आवे । रावण के शिर फिर से निकल आये । उन्होंने रावण का शिर नहीं बदला । गणेशजी का तथा अन्य लोगों का शिर तो बदल दिया, पर रावण के शिर का न तो मुण्डमाल बनाया और न ही उसे बदला । मानो यह रावण पर व्यंग्य था । रावण के दश शिर थे । उनके सामने जब भगवान शंकर प्रकट हुए, तो उसने देखा कि उनके पाँच मुख हैं । यह देखकर रावण के मन में सबसे पहले यही बात आयी कि चलो ! कम से कम मैं इनसे दुगना हूँ । भगवान शंकर ने कहा - भाई ! तुम्हारे शिर तुम्हारे ही पास रहें, तो अच्छा है, वे न तो काटने योग्य हैं, न बदलने योग्य हैं ।

Wednesday, 30 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

.......कल से आगे ......
पार्वतीजी बड़ी दुखी हुईं, रोने लगीं। हाय ! आपने मेरे पुत्र का शिर काट दिया ? शंकरजी मुस्कराते बोले - पार्वती ! तुमने भूल की, बालक का निर्माण तो दो के द्वारा होता है, तुमने अकेले ही इस बालक का निर्माण कर लिया । इसका अभिप्राय यह है कि जिस गणेश का निर्माण केवल श्रद्धा के द्वारा होगा, उसमें विश्वास का अभाव होगा । श्रद्धा बुद्धितत्त्व है और विश्वास ह्रदयतत्त्व । दोनों का सामंजस्य होना चाहिए । तुमने अकेले ही बालक का निर्माण कर दिया । अच्छा ! कोई बात नहीं है, नया शिर जोड़ देते हैं । इस तरह गणेशजी का गले तक का भाग पार्वतीजी की सृष्टि है और शिर शंकरजी का दिया हुआ है । ये ही गणेशजी हैं, जिनकी हम पूजा करते हैं, जिनका निर्माण पार्वतीजी और शंकरजी के द्वारा हुआ । जो श्रद्धा और विश्वास का समन्वय रूप है ।

Tuesday, 29 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

गणेशजी के प्रसंग में भी देखें । पार्वतीजी ने स्नान करते समय गणेशजी का निर्माण कर दिया । यह बड़ी सांकेतिक भाषा है । गणेशजी का निर्माण अकेली पार्वतीजी ने ही कर दिया । गणेशजी ने पूछा - माँ ! क्या आज्ञा है ? तो पार्वतीजी ने कहा - तुम पहरे पर खड़े रहो, कोई अन्दर न आने पावे । गणेशजी दरवाजे पर खड़े हो गए । संयोग से शंकरजी ही आ गये और भीतर जाने लगे । गणेशजी शंकरजी को पहचानते नहीं थे, उन्होंने तुरंत उनको रोक दिया । शंकरजी ने कहा - क्या तुम मुझे पहचानते हो ? उन्होंने कहा - न पहचानता हूँ और न इसकी आवश्यकता ही है; मैं तो माँ की आज्ञा का पालन करूँगा । केवल शब्द को पकड़ लिया गणेशजी ने । कभी-कभी विद्वान लोग शब्द को बड़ा महत्व देते हैं । गणेशजी ने कहा - माँ ने कहा है कि किसी को भीतर न आने देना । अब किसी को भीतर न आने देने का अर्थ यह तो नहीं है कि गृहस्वामी को ही रोक दें । शंकरजी ने उनका शिर काट दिया और भीतर चले गए । पार्वतीजी ने पूछा - महाराज ! उस बालक ने आपको द्वार पर रोका तो नहीं ? बोले - रोका तो था । फिर आपने क्या किया ? बोले - मैंने उसका शिर काट दिया ।
     ......आगे कल .......

Monday, 28 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

दक्ष का क्षुद्र 'अहं' विराट 'अहं' का विरोध कर रहा था । वीरभद्र ने उसे नष्ट कर दिया । तब देवताओं ने जाकर भगवान शंकर से प्रार्थना की तो वे मुस्कुराते हुए यज्ञस्थल पर आ गए और कहा - अच्छा ! अब हम दक्ष के गले पर नया शिर जोड़ देते हैं । पुराना शिर तो नहीं जोड़ेंगे, क्योंकि वह बड़ा झगड़ेवाला शिर है, वह तो अग्निकुण्ड में गया । व्यष्टि अहंकार वाला शिर वीरभद्र ने नष्ट कर दिया । अब कौन-सा शिर जोड़ेंगे ? उन्होंने कहा - बकरे का शिर ! बकरे का शिर जुड़ते ही दक्ष भगवान शंकर की स्तुति करने लगे । बड़ी सुन्दर स्तुति है वह । इसलिए आज भी शंकरजी के भक्तों में यह परम्परा चली आ रही है कि पूजा की पूर्णता के लिए अंत में बकरे की बोली अवश्य बोलना चाहिए । इसका अर्थ क्या है ? यह कि याद रखें कि अभिमान के कारण ही दक्ष की दुर्दशा हुई थी । भगवान शंकर की कृपा यही है कि वे अहंकार को नष्ट कर देते हैं और फिर ममता का परिचय देते हुए नया शिर जोड़ देते हैं । वे क्रोधी नहीं हैं, क्रोध में आकर किसी को मार डालने के लिए किसी का शिर नहीं काटते । वे तो बचाने के लिए शिर को काटते हैं ।

Sunday, 27 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

दक्ष ने भगवान शंकर को आमंत्रित नहीं किया । भगवान शंकर नहीं आये, तो ब्रह्मा और विष्णु भी नहीं आये । तब दक्ष के यज्ञ का क्या हुआ ? गोस्वामीजी ने कहा - विधिहीन, विश्वासहीन एवं यज्ञपुरुष से विहिन यज्ञ का रुद्रगणों ने विध्वंस करना आरंभ कर दिया । भृगु मंत्रों के महान ज्ञाता थे । उन्हें अपने ऋषित्व पर बड़ा अभिमान हुआ । उन्होंने अपने मंत्रों के प्रभाव से रुद्रगणों को परास्त कर दिया और अभिमान करने लगे कि देखो मैंने रुद्रगणों को परास्त कर दिया । लेकिन भगवान शंकर ने तुरंत वीरभद्र को भेजा । वीरभद्र ने यज्ञ तो नष्ट किया ही, साथ ही उन्होंने दक्ष के शिर को काटा तो नहीं परन्तु मरोड़कर तोड़ दिया और ब्रह्मकुण्ड में फेंक दिया । सारे देवता भगवान शंकर के पास गये और उनसे कहा - महाराज ! आपके गणों ने यज्ञ का ध्वंस कर दिया । भगवान शंकर हँसते हुए बोले - यज्ञ ध्वंस किया या यज्ञ पूर्ण किया ? स्धूल दृष्टि से देखें, तो यज्ञ का ध्वंस किया और सुक्ष्म दृष्टि से देखें, तो उन्होंने यज्ञ को पूरा किया । कैसे ? बोले - यज्ञ तो पूर्ण होता है आहुति के द्वारा और यज्ञ की अन्तिम आहुति है अहंता और ममता । जिस यज्ञ में यजमान अपने 'मैं' तथा 'मेरेपन' की आहुति देता है, वही सच्चे अर्थों में आहुति देकर यज्ञ पूरा करता है । सती के देहत्याग से मानो ममता की आहुति हो गयी और दक्ष के क्षुद्र 'अहं' की आहुति देने के लिए भगवान शंकर ने वीरभद्र को भेज दिया ।

Saturday, 26 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

  .....कल से आगे .....
जिस बारात का स्वागत करना हो, वह बारात बड़ी ठाठदार हो और पता लगे कि बारात तो पूरी आ गयी है, पर केवल तीन ही लोग नहीं आये हैं । कौन-कौन ? बस, केवल दूल्हा, उसके पिता और बड़े भाई नहीं आये, बाकी सभी बाराती आ गये हैं । अब ऐसी बारात, जिसमें दूल्हा न हो, वह बारात स्वागत करने योग्य है क्या ? इसका अभिप्राय यह है कि ये तीनों देवता तो यज्ञ के तीन प्रमुख अंग हैं । ब्रह्मा विधि हैं, शंकर विश्वास हैं और विष्णु यज्ञपुरुष हैं । तो क्या यह सही अर्थों में यज्ञ है ? दक्ष ने शंकर को नहीं बुलाया, इसलिए शंकर नहीं आये, किन्तु ब्रह्मा और विष्णु क्यों नहीं आये ? विधि और यज्ञपुरुष क्यों नहीं आये ? जो अविवेकी मर्यादावादी होते हैं, वे केवल कर्मकांड को ही विधि समझ बैठते हैं । वास्तव में विधि क्या है ? विश्वास ही सबसे बड़ी विधि है । भगवान शंकर विश्वास हैं । उनको सबसे पहले बुलाना चाहिए । अगर आपको यज्ञ में विश्वास नहीं है, तो आप कर्मकांड के सारे नियमों का चाहे कितनी भी सावधानी से पालन करें, आपको उस कार्य में सिद्धी नहीं मिलेगी ।

Friday, 25 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया । उस यज्ञ में उन्होंने समस्त ऋषि-मुनि और देवताओं को आमंत्रित किया, केवल शंकरजी को नहीं बुलाया । सारे देवता दक्ष के पक्षधर थे । ऋषि-मुनियों को भी लगता था कि शिव का आचरण वैदिक परम्परा के अनुकूल नहीं है । किसको इस दक्षयज्ञ का आचार्य बनाया गया ? भृगु जैसे महापुरूष को । अब कथा में तो यह भी कहा गया है कि भरी सभा में जब दक्ष ने शिवजी की निन्दा की, तो भृगु ने भी दाढ़ी हिला-हिलाकर बड़ी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि दक्ष ! तुम बिल्कुल ठीक कहते हो । दक्ष ने शंकरजी को यज्ञ में नहीं बुलाया, इसलिए शंकरजी तो नहीं आये, पर साथ ही निमंत्रण पाने के बावजूद दो अन्य देवता भी नहीं आये । वे कौन थे ? बोले - शंकरजी को तो निमंत्रण ही नहीं मिला था, लेकिन ब्रह्मा और विष्णु निमंत्रण पाकर भी नहीं आये थे । इस प्रकार उस यज्ञ में सब तो आये, पर ये तीन देवता नहीं आये । तीन को छोड़कर बाकी सब देवताओं को आया देखकर दक्ष प्रसन्न हो गये । बोले - कोई बात नही, करोड़ों देवता आये हैं, अब अगर तीन नहीं भी आये, तो कोई खास बात नहीं है । अब उस अभागे के विषय में क्या कहा जाय ?
          ........आगे कल .......

Thursday, 24 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

ब्रह्माजी के पाँच शिर थे । उनमें से एक को शंकरजी ने काट दिया, चार रहने दिया । नया शिर उन्होंने नहीं जोड़ा । बोले - आपको नये शिर की आवश्यकता नहीं है, ये चार ही पर्याप्त हैं । इसका तात्विक अभिप्राय क्या है ? ब्रह्मा को अपनी कृति के सौन्दर्य के प्रति आकर्षण का अनुभव हुआ और वे उनके पीछे भागे । तब भगवान शंकर ने तुरंत उनका शिर काट दिया । इसका अभिप्राय यह है कि जो सृजन करते हैं, उनमें सबसे बड़ा दोष यह होता है कि वे अपनी कृति के सौन्दर्य पर मोहित हो जाते हैं और उसके पीछे भागने लगते हैं । उनकी अपनी कृति के प्रति आसक्ति का केन्द्र यह पाँचवा शिर था । भगवान शंकर ने ब्रह्मा की इस आसक्ति बुद्धि को, इस पाँचवे शिर को काट दिया । बोले - सृजन के लिए ये चार शिर ही ठीक हैं, आसक्ति वाला शिर ठीक नहीं है । इसलिए अब तुम चार शिर वाले ही रहो ।

Wednesday, 23 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

भगवान शंकर के चरित्र में शिर काटने का प्रसंग बार-बार आता है । ब्रह्मा के पाँच शिर थे, उनका एक शिर काट दिया था । शंकरजी के श्वसुर दक्ष का शिर भी भगवान शंकर की ही प्रेरणा से कट गया और अपने पुत्र गणेश का शिर भी स्वयं उन्होंने काट लिया था । इसका अभिप्राय यह है कि शंकरजी तो हैं विश्वास के देवता और यह शिर ही है, जो विश्वास के विरूद्ध बार-बार विद्रोह करता है । इसलिए वे शिर को ही पहले काटते हैं । शिर माने क्या ? शिर बुद्धि का स्थान है । अब प्रश्न उठता है कि क्या विश्वास को बुद्धि की आवश्यकता नहीं है  ? बुद्धि में दो प्रकार की वृत्ति है, संशय की वृत्ति और विवेक की वृत्ति । जहाँ पर संशय की वृत्ति है, वहाँ पर वे शिर काट देते हैं और विवेक वृत्ति का एक नया शिर जोड़ देते हैं ।

Tuesday, 22 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

शिव हैं समष्टि अहंकार । इस तत्व को ठीक-ठीक न समझ पाने के कारण ही शिव के स्वरूप के बारे में भ्रांतिपूर्ण धारणा बन जाती है । शिव में द्वैत नहीं है, राग नहीं है । रावण भी शंकर का पुजारी है । किन्तु वह भगवान शिव के इस स्वरूप को किस दृष्टि से देखता है, क्या अर्थ लेता है ? रावण की धारणा है कि शिव जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं और जो भी माँगो, वही वर दे देते हैं । यह तो रावण की बुद्धि है, पर शंकरजी क्या कहते हैं ? - मेरे पास कमी नहीं है, थोड़ा मत माँगना । इसका अभिप्राय क्या है ? बेचारे जो दरिद्र वृत्तिवाले हैं, उनको लगता होगा कि हजार रूपये कम हैं, तो लाख माँग लें । इसे ही वही बहुत समझता है । अरे भाई ! रामायण में तो यहाँ तक कहा गया है कि स्वर्ग माँगना भी थोड़ा है । भगवान शिव का तात्पर्य है कि मुझे पाने के बाद भी अगर कोई भगवत्-तत्व को पा ले तो यही पाने की सार्थकता है किन्तु मुझे पाने के बाद भी अगर कोई वह पाने से वंचित रह गया, तो इससे बढ़कर दुर्भाग्य भला और क्या होगा ? मुझे पाकर भी अगर कोई ऐसी वस्तुओं की माँग कर बैठे, जो अनित्य है, जिसे कोई भी अपने ही प्रयास से या अन्य उपायों से पा सकता है तथा जिसे पाने के साथ खोना भी अनिवार्य रूप से जुड़ा हुआ है, ऐसी वस्तु मुझसे माँगने में क्या सार्थकता है ?

Monday, 21 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

कुछ लोग मानकर ही चलते हैं कि 'मैं' का नशा होगा तो जीवन में सफलता ही सफलता मिलेगी । दिखाई भी देता है कि लोग अपने जीवन में 'मैं' को पाल लेते हैं और इसी 'मैं' के द्वारा बड़े-बड़े काम कर रहे हैं । दैत्यदर्शन भी यही है । दैत्य यही तो कहता है कि हम शिव के उपासक हैं, 'मैं' के उपासक हैं । हम देवताओं की तरह प्रतीक्षा क्यों करें ? हममें पुरूषार्थ है, शक्ति है । हम क्यों यज्ञ करते बैठे रहेंगे ? सीधा आक्रमण करके छीन लेंगे । पुराणों में समुद्र-मंधन के प्रसंग में एक तात्विक गाथा है । देवता और दैत्य अमृत पाने के लिए समुद्र मंथन करते हैं, लेकिन जब अमृत मिला तो उसका बँटवारा बड़ा विचित्र हुआ । अमृत का पात्र तो एक ही था, पर इस पात्र से एक ओर दैत्यों के लिए सुरा और देवताओं के लिए अमृत गिर रहा था । इसका तात्विक तात्पर्य यह है कि एक ओर ज्ञान का अमृत है और दूसरी ओर अभिमान का सुरा । इन दोनों के बीच बस दैत्य और दैववृत्ति का ही अंतर है । जो ज्ञान का अमृत पी रहे हैं, वे देवताओं की पंक्ति में बैठे हुए हैं और जो अभिमान, पद, धन, बुद्धिमता, जाति आदि के रूप में किसी न किसी प्रकार की मदिरा पीकर उन्मत्त हो रहे हैं, वे दैत्यों की पंक्ति में बैठे हैं । यही दैत्यवृत्ति है ।

Sunday, 20 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

.....कल से आगे ........
अब अगर एक व्यक्ति को एक गिलास दूध दिया जाय तथा दूसरे व्यक्ति को एक गिलास सुरा और दोनों पी लें, तो तत्काल असर किस पर होगा ? सुरा पीने वाला ही तत्काल मतवाला हो उठेगा ! उसे तुरंत स्फूर्ति की अनुभूति होगी । बड़ी स्वाभाविक बात है कि दूध पीने से ऐसा नहीं होता । दूध का परिणाम तो बड़ा दूरगामी होता है, तत्काल तो कुछ पता नहीं चलता । इसलिए लोग जो इतनी बड़ी संख्या में शराब पीते हैं, उनमें इसी तात्कालिक स्फूर्ति को पाने की वृत्ति है, किन्तु यह स्फूर्ति क्षणिक तथा नकली होती है और थोड़ी देर में एक गहरा अवसाद देकर चली जाती है । इस तरह 'अहं' एक नकली स्फूर्ति है, जिसके द्वारा व्यक्ति जीवन में नकली सफलता पाने की नकली प्रेरणा प्राप्त करता है और प्रसन्न होता है, समाज में सफलता प्राप्त करने को उत्साहित होता है । एक सज्जन से पूछा गया - आप शराब क्यों पीते हैं ? कहने लगे - बिना पिये मुझसे बोला नहीं जाता और पीते ही मेरी वाग्धारा खुल जाती है । केवल शराब के संबंध में ही नहीं, कुछ लोग तो यह मानकर चलते हैं कि सफलता का मूलमंत्र ही 'अहं' है और यह 'अहं' भी मद ही है ।

Saturday, 19 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

भगवान शिव के संबंध में दैत्यों अथवा दैत्यवृत्ति वालों की जो धारणा है, उनकी जो दृष्टि है, वे भगवान शिव के स्वरूप से जो प्रेरणा लेते हैं, वह भी बड़ा विलक्षण है । कभी-कभी अखबार में पढ़ने को मिलता है कि अमुक डाकू डाका डालने के पहले अमुक देवी या देवता की पूजा करता है । पढ़ने वाले गदगद हो जाते हैं - वाह ! डाकू होते हुए भी उसकी देवी-देवता पर कितनी भक्ति है । उस पर शंकरजी की कृपा है, तभी तो कोई उसका बाल भी बाँका नहीं कर पाता, उसे पकड़ नहीं सकता । तो क्या यही देवी-देवता की प्रसन्नता का लक्षण है, या फिर क्या यही भक्ति का लक्षण है ? हनुमानजी और शंकरजी को अब यही काम रह गया है कि कोई डाका डाले और वे उसकी सहायता करें ? इसका तात्विक अर्थ यह है कि दैत्य अहं का पुजारी होता है । इसे हम संक्षिप्त में यों कहें कि ये दो वृत्तियाँ हैं - एक क्षणिक और दूसरी स्थायी, जैसे सुरा और दूध । दूध पौष्टिक है और सुरा स्फूर्ति तथा उत्तेजना प्रदान करती है । देवदर्शन मानो दूध है और दैत्य दर्शन सुरा के समान है । दैत्य के जीवन में 'अहं' की प्रधानता है । अहं के लिए एक शब्द और है 'मद' और मद का अर्थ सुरा भी है । इसलिए दैत्यदर्शन सुरा के समान है ।
    .....आगे कल .....

Friday, 18 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

शिव का जो स्वरूप है, जो सत्य है, उसका हम क्या अर्थ लेते हैं ? क्या प्रेरणा लेते हैं ? यह बड़े महत्व की बात है । हम शिव का अर्थ वैराग्य लेते हैं या उत्छृंखलता, अद्वैत लेते हैं या द्वैत, मर्यादा का उल्लंघन लेते हैं या परम मुक्ति । उत्छृंखलता और मुक्ति बड़े निकट के तत्व हैं । मुक्ति में कोई बंधन नहीं है और उत्छृंखलता में भी । अब शिवजी की अवस्था उत्छृंखलता है या मुक्ति । दैत्य इसका अर्थ लेते हैं उत्छृंखलता और साधक लेते हैं मुक्ति । सच्चा साधक शिवजी के स्वरूप को अद्वैत की अवस्था समझता है, जहाँ व्यक्ति की क्षुद्र अहंता तथा ममता का द्वैत मिट जाता है और वह मुक्त हो जाता है । यही शिव का यथार्थ स्वरूप है ।

Thursday, 17 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भक्ति की भाषा दूसरी है । उसमें सब 'तू' ही 'तू' है । तुझे छोड़कर और कुछ है ही नहीं । इसे यूँ कह सकते हैं कि चाहे 'मैं' मिट जाय या फिर 'तू' मिट जाय, परन्तु द्वैत को मिटना ही चाहिए । 'तू' मिटकर अगर केवल 'मैं' रह जाय, व्यक्ति को सारा ब्रह्मांड, सर्वत्र अपना ही स्वरूप दिखाई देने लगे अथवा 'मैं' मिटकर केवल 'तू' ही 'तू' रह जाय और सर्वत्र उसे ईश्वर ही दिखाई देने लगे, सेवाभाव का उदय हो जाय, तो फिर कौन किसका विरोध करेगा ? कौन किससे ईर्ष्या, किससे कपट करेगा ? जिन दुर्गुण-दुर्विचारों की चर्चा पिछले दिनों चलती रही है, उसका मूल कारण क्या है ? मनुष्य के मन में जो भेदबुद्धि है, उसके ही कारण तो ये उत्पन्न होते और पनपते हैं । 'मैं' यदि सचमुच इतना व्यापक हो जाय कि वह सारे ब्रह्मांड को अपने में समेट ले, कोई पराया ही न रह जाए, तब तो विरोध करने की वृत्ति ही नहीं रह जायेगी । यही 'अहं' शिव का वास्तविक स्वरूप है, लेकिन उनके इस स्वरूप को न जानकर, जो अपने क्षुद्र 'अहं' से उनकी तुलना करते हैं, उन्हें एक खण्ड 'अहं' के रूप में देखते हैं तथा उसी कसौटी के आधार पर विचार करते हैं, वे अपने क्षुद्र अहं को ही शिव पर आरोपित करते हैं ।

Wednesday, 16 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

अहंकार के दो प्रकार के हैं - एक तो समष्टि अहंकार और दूसरा व्यष्टि अहंकार । एक समग्र विराट का 'मैं' और दूसरा हर व्यक्ति का अलग-अलग, खण्ड-खण्ड 'मैं' । इस खण्ड 'मैं' के साथ 'तू' जुड़ा हुआ है अर्थात 'मैं अच्छा तू बुरा', 'मैं बुद्धिमान तू मुर्ख', 'मैं उच्च तू नीच' । 'अखण्ड मैं' यह है, जहाँ 'तू' है ही नहीं, केवल मैं एकमात्र ब्रह्म । शिव वह 'मैं' है जहाँ कोई खण्ड नहीं है, जहाँ व्यक्ति-व्यक्ति का, अलग-अलग, खण्ड-खण्ड 'मैं' समाप्त हो जाता है, जहाँ सारा ब्रह्मांड अपना ही स्वरूप दिखाई देने लगता है, ऐसा बोध होता है कि विविध रूपों में मैं ही हूँ, यह विराट 'अहं' की अनुभूति ही शिव का स्वरूप है । इस विराट 'अहं' को ठीक-ठीक देख लेने पर 'मैं और तू' का भान ही नहीं रह जाता और जहाँ कोई पराया नहीं है, वहाँ विरोध किससे ? जहाँ अपने 'मैं' को छोड़कर कोई दूसरा है ही नहीं, वहाँ किसी को क्षुद्र या छोटा समझने का प्रश्न ही कहाँ उठता है ? यह वेदान्त की भाषा है । ज्ञान की दृष्टि में यह जो कुछ है, वहाँ सब 'मैं' ही 'मैं' है ।

Tuesday, 15 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

गोस्वामीजी कहते हैं कि लंका राक्षसों की नगरी है । अब इन दुर्गुण-दुर्विचारों को चाहे आप रोग कह लीजिए या राक्षस, वह तो एक काव्य है । दोनों का अर्थ एक ही है । रोग भी व्यक्ति को नष्ट कर देते हैं और राक्षस भी । एक ओर तो विनयपत्रिका में यह कहा गया कि रावण का भाई कुम्भकर्ण अहंकार का प्रतीक है और दूसरी ओर जहाँ विराट भगवान का परिचय दिया गया, वहाँ बताया गया कि  शंकरजी मूर्तिमान अहंकार हैं । अब अहंकार के साथ यह कौन-सी समस्या जुड़ गयी ? कुम्भकर्ण भी अहंकार है और भगवान शंकर भी । एक ओर जहाँ रामायण का एक अत्यंत निन्दनीय और कठोर पात्र कुम्भकर्ण अहंकार का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर जिनकी पग-पग पर प्रशंसा और पूजा की जाती है, वे शंकरजी भी अहंकार के प्रतीक हैं । यही 'अहं' की सर्वव्यापकता है । यह 'अहं' शब्द कैसे बना ? इस पर संस्कृत साहित्य में एक प्रसिद्ध उक्ति प्रचलित है, जिसमें कहा गया कि वर्णमाला का पहला अक्षर 'अ' है । 'अ' से ही वर्णमाला प्रारंभ होती है और उसका अंतिम अक्षर 'ह' है । इसका तात्पर्य हुआ कि 'अ' से लेकर 'ह' तक सारे स्वर तथा व्यंजन जिसमें समाये हुए हों, सारी सृष्टि जिसमें समायी हुई हो, वही यह 'अहं' है ।

Monday, 14 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

व्यक्ति के जीवन में ऐसा कोई क्षण नहीं है, जिसमें 'मैं' अविद्यमान हो । इसकी सबसे बड़ी कसौटी क्या है ? जब हम सो जाते हैं, तो साथ ही शरीर सो जाता है, सारी इन्द्रियाँ भी सो जाती हैं, लेकिन उस समय भी कोई एक ऐसा है, जो जागता रहता है । कौन ? वही जो कहता है कि अच्छी नींद लगी थी, खूब मजे से सोया । सोकर उठने के बाद हमारे मुख से यह जो शब्द निकलता है कि खुब चैन से सोया । इसे कौन अनुभव करता है ? कौन बोलता है ? मन, बुद्धि और चित्त भले ही न दिखाई देते हों, पर यह 'मैं' जो नींद के सुख को अनुभव कर रहा था, वह गहरी नींद में भी 'अहं' के रूप में जाग रहा था । इस तरह से यह अहं व्यक्ति के जीवन में जन्म से लेकर अन्तिम क्षण तक प्रत्येक क्रिया में शाश्वत रूप से जुड़ा हुआ है । इतना ही नहीं, इसकी विलक्षणता यह है कि यह पाप के साथ तो जुड़ा ही हुआ है, व्यक्ति के सत्कर्म और पुण्य के साथ भी जुड़ा हुआ है । यह अधर्म के साथ तो जुड़ा ही हुआ है, किन्तु धर्म के साथ भी जुड़ा है । अज्ञान के साथ तो जुड़ा ही है, पर ज्ञान के साथ भी यह 'अहं' जुड़ा हुआ है । इस प्रकार जो अहंकार जीवन में एक क्षण के लिए भी व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ता, जो प्रत्येक वृत्ति के साथ व्यक्ति के अन्तःकरण में विद्यमान है, उस 'अहं' से मुक्त हो पाना कितना कठिन होगा, इस पर हम विचार करेंगे, विशेष रूप से जब एक साधक अपने अन्तर्जीवन को देखता है, तो उसे ऐसा प्रतीत होता है कि सचमुच ही इस अहं पर विजय पाना सर्वाधिक कठिन है । इसे रामायण में एक दूसरी शैली में भी प्रकट किया गया है, जिसकी चर्चा हम आने वाले दिनों में करेंगे ।

Sunday, 13 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

अभिमान की परिभाषा क्या है ? जैसे अग्नि का स्वभाव है दाहकता, इसी तरह प्रकृति में जितने भी पदार्थ हैं, उन सबका अलग-थलग धर्म है । अभिमान के लिए कहा गया है -
        हरष विषाद ग्यान अग्याना ।
        जीव धर्म अहमिति अभिमाना ।।
अग्यान और अभिमान ही जीव का लक्षण तथा धर्म है । इसका अभिप्राय क्या है ? व्यक्ति के मन में कुछ ऐसे रोग हैं, जिनकी एक सीमा है, एक अवधि है । किसी कारण से वे उत्पन्न होते हैं और कुछ समय बाद दूर हो जाते हैं । उदाहरण के लिए काम को ही लें । काम व्यक्ति के जीवन में उत्पन्न होता है, पर कुछ समय बाद वह शान्त हो जाता है, कुछ समय बाद व्यक्ति उससे विरक्त भी हो जाता है । क्रोध भी चाहे कितना ही प्रचण्ड क्यों न हो ! कुछ काल बाद शान्त हो जाता है । लोभ के साथ अवश्य ही एक जटिल समस्या है, इसलिए गोस्वामीजी ने उसके साथ भी एक शब्द जोड़ दिया है - 'काम बात कफ लोभ अपारा'। लोभ के साथ अपार शब्द का प्रयोग किया गया । इसका अभिप्राय यह है कि काम की तो एक सीमा है, तृप्ति है, विराम है; क्रोध की भी एक सीमा है, परन्तु व्यक्ति के जीवन में लोभ की कोई सीमा नहीं है । इसलिए लोभ के साथ कहा गया - 'अपारा अर्थात जो असीम हो, लेकिन इतना होते हुए भी कोई कितना भी बड़ा लोभी क्यों न हो ? जब वह विश्राम करने जाता है, सोना चाहता है, तब तो वह लोभ की वृत्ति से अलग रहता है । लेकिन जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, जन्म के पूर्व एवं जन्म के बाद जीवन के प्रत्येक घटना के साथ जुड़ी हुई जो वस्तु है, वह क्या है ? यह अभिमान ही ऐसा विलक्षण है, जिसका परिचय रामायण में 'जीव का धर्म' कहकर दिया गया है ।

Saturday, 12 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

श्रीरामचरितमानस में अहंकार को एक अत्यंत जटिल रोग के रूप में प्रस्तुत किया गया है । कुछ रोग तो ऐसे हैं जो उत्पन्न होते हैं और समाप्त हो जाते हैं । ऐसे रोगों को सहन कर लेना तथा उनकी चिकित्सा करना अपेक्षाकृत सरल होता है । रोग यदि कुपथ्य या किसी विशेष परिस्थिति से उत्पन्न हुआ हो, तब तो उसे औषध तथा पथ्य के द्वारा दूर किया जा सकता है, किन्तु जो रोग जन्म से ही व्यक्ति के साथ लगा हो और जीवनभर उसके लगे रहने की संभावना हो, तब तो व्यक्ति यह सुनकर टूट जायेगा कि जीवनभर चिकित्सा में लगे रहना होगा और सर्वदा इस अति दुखद डमरुआ रोग को भोगना पड़ेगा और कहना न होगा कि अंत में मृत्यु का कारण भी वही बनेगा ।

Friday, 11 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ...........

श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में मन के रोगों की वर्णन करते हुए गोस्वामीजी प्रारंभ में ही कहते हैं -
       सुनहु तात अब मानस रोगा ।
        जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा ।।
अब उन मानस-रोगों का वर्णन सुनिए ! जिनसे सब लोग दुख पाते हैं । लेकिन जब मानस-रोग संबंधी उन सारी पंक्तियों को हम ध्यान से पढ़ेंगे, तो दिखाई देगा कि किसी-किसी रोग में दुख के साथ गोस्वामीजी एक अन्य विशेषण भी जोड़ देते हैं । आगे हम जिस पंक्ति पर चर्चा करने जा रहे हैं, उसमें भी दुख के साथ एक विशेषण जुड़ा हुआ है । गोस्वामीजी कहते हैं -
        अहंकार अति दुखद डमरुआ ।
        दंभ कपट मद मान नेहरुआ ।।
यहाँ उनका अभिप्राय यह है कि वैसे तो मन के सभी रोग दुखद होते हैं, परन्तु यह जो अहंकार का रोग है, वह 'अति दुखद' - अत्यंत दुख देने वाला है अर्थात यह अहंकार का डमरुआ अत्यंत दुख देने वाला रोग है । शरीर के रोगों के साथ मन के रोगों की तुलना करते हुए गोस्वामीजी अहंकार की तुलना शरीर के डमरुआ रोग से करते हैं । डमरुआ पेट का रोग हैं, जिसमें रोगी का पेट बहुत बढ़ जाता है और रोगी के लिए कुछ भी पचा पाना संभव नहीं होता और रोगी धीरे-धीरे शक्तिहीन होकर कालग्रस्त हो जाता है ।

Thursday, 10 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

इन प्रसंगों का मूल आशय यह है कि शरीर के संदर्भ में भी कुटिलता तथा छल-कपट की वृत्ति बड़ी घातक है, क्योंकि इससे रोग भीतर ही भीतर पनपता तथा फैलता रहता है और इसी प्रकार मन के रोगों के संदर्भ में भी, जिनके ह्रदय में अपने दोषों को छिपाने की वृत्ति है, वह स्वयं तो कष्ट भोगता ही है, साथ-साथ दूसरों में भी उस रोग को फैलाता है । किन्तु जो व्यक्ति भगवान के सामने अपने दोषों को बड़ी सरलता से निवेदन करते हुए प्रार्थना करता है, उसके जीवन में भगवान की कृपा से भक्ति की सरलता आती है और उसके मन का यह कुष्ट रोग अर्थात दुष्टता और कुटिलता की वृत्ति दूर हो जाती है ।

Wednesday, 9 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

भगवान राम की सरलता देखकर गुरु प्रसन्न हो गये और बोले कि राम ! तुम क्या लेकर आये हो ? श्रीराम बोले - महाराज ! फूल लेकर आये हैं । उन्होने कहा - संसार में फल के प्रेमी तो बहुत हैं, पर फूल के प्रेमी कम हैं । कर्मफल के प्रेमी बहुत हैं, परन्तु कर्म के प्रेमी बहुत कम हैं । यह जो तुम पुष्प लेकर आये हो, मेरी आज्ञा का जो पालन किया, यह तुम्हारी साधन-प्रीति का परिचायक है, किन्तु साधना कभी निष्फल नहीं होती । मेरी आज्ञा से तुम पुष्प लेकर आये हो, तो लो तुम्हारे लिए यह फल लिये बैठा हूँ । महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम को आर्शीवाद दिया -
        सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे ।
        रामु लखनु सुनि भए सुखारे ।।
भक्ति को पाने के लिए सरलता ही सबसे महत्वपूर्ण गुण है । इसलिए भगवान राम ने अपने चरित्र के माध्यम से इस सत्य को प्रकट किया । वे स्वयं अत्यंत सरल हैं । इसी सरलता के मार्ग से उन्होंने भक्तिदेवी को पाया और अपने भक्तों से भी इसी सरलता की अपेक्षा रखते हैं । सरलता ही उन्हें सर्वाधिक प्रिय है और यही सरलता सुग्रीव के चरित्र में तथा उनके प्रिय होने वाले असंख्य भक्तों में विद्यमान है । विभिन्न भक्तों के जीवन में अन्य लक्षणों की भिन्नता हो सकती है, परन्तु जहाँ तक सरलता का प्रश्न है, यह प्रभु के प्रिय समस्त भक्तों में विद्यमान है ।

Tuesday, 8 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ............

भगवान राम ने श्रीसीताजी को पाया, क्रम तो प्रारंभ में वही है - भगवान श्रीराम महर्षि विश्वामित्र की आज्ञा से पुष्प लेने पुष्पवाटिका गये, वहाँ उन्होंने श्रीसीताजी के आभूषणों की ध्वनि सुनी, सुनकर उनके मन में अनुराग उत्पन्न हुआ । वे अपने अन्तर्मन की भावना को लक्ष्मणजी को सुनाते हुए गुरू के पास चले -
     ह्रदयँ सराहत सीय लोनाई ।
     गुर समीप गवने दोउ भाई ।।
इस क्रम का समापन कहाँ हुआ ? दोनों भाई गुरू के पास पहुँचे और भक्ति को पाने का क्रम यहीं पूरा हो जाता है । भगवान राम ने महर्षि विश्वामित्र के चरणों में प्रणाम करने के बाद, पुष्पवाटिका में उन्हें जैसा अनुभव हुआ, वे सारी बातें बड़ी सरलतापूर्वक कह दीं । गुरू नहीं पूछ रहे हैं कि इतनी देर कैसे हुई ? बिना पूछे ही भगवान राम स्वयं सारी बातें गुरू को बता देते हैं ।
      पार्वतीजी कथा सुन रही थीं । भगवान शंकर से पूछ बैठीं - महाराज! श्रृंगार की चर्चा भी क्या कभी गुरू को सुनायी जाती है ? आपके राम तो बड़े विलक्षण हैं । श्रीराम श्रीसीताजी के सौन्दर्य को देखकर मुग्ध हुए, तो पहले छोटे भाई को सुना दिया और अब गुरूजी को सुना रहे हैं । श्रृंगार की बात न तो छोटे से कही जाती है और न बड़े से । इन्होंने तो छोटे से भी कह दिया और बड़े से भी । तब शंकरजी ने एक ही बात में समाधान कर दिया । बोले कि इसके बिना तो सीताजी मिलेंगी ही नहीं । भक्ति की पराकाष्ठा है सरलता । सरलता के बिना भक्ति नहीं मिल सकती । भक्ति को पाने का यही क्रम है ।

Monday, 7 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

सीताजी व्याकुल होकर श्रीराम को पुष्पवाटिका में खोज रही हैं और तब ब्रह्म का साक्षात्कार हुआ, ज्ञान का साक्षात्कार हुआ । किस रूप में हुआ ? श्रीराम दिखायी तो दे रहे हैं, परन्तु लता की ओट में । यह सांकेतिक भाषा है । लता माया की प्रतीक है । माया के संदर्भ में वेदांतशास्त्र ब्रह्म के दो भेद करता है - सविशेष और निर्विशेष । जो लता से आवृत है, वह मानो सविशेष ब्रह्म है और जो लता से अनावृत होकर प्रकट हो जाता है वह निर्विशेष है । इसी क्रम से सीताजी भगवान राम का साक्षात्कार करती हैं और उन्हें अपने ह्रदय में धारण कर लेती हैं। यही ज्ञानप्राप्ति का क्रम है । ज्ञान प्राप्ति के जितने क्रम हो सकते हैं वे सभी सीताजी के चरित्र से सीखे जा सकते हैं । भक्ति पाने का भी यही क्रम है, पर एक अन्तर है । सीताजी ने भगवान राम को पाया, पर उनका मार्ग कुछ लम्बा निकला । पहले उन्होंने सुना, फिर खोजने निकलीं, व्याकुलता हुई, दिखायी पड़े तो पहले आड़ में दिखायी पड़े एवं फिर प्रत्यक्ष दिखायी पड़े । उसके बाद श्रीराम को छोड़कर जाना पड़ा, तो वे पार्वतीजी के मंदिर में गयीं । मंदिर में पार्वतीजी का वरदान मिला और तब उन्हें भगवान की प्राप्ति हुई ।

Sunday, 6 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

"भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ"
भगवती पार्वती मूर्तिमती श्रद्धा हैं और भगवान शंकर मूर्तिमान् विश्वास । इसके द्वारा वे यह संकेत करते हैं कि जब तक श्रद्धा और विश्वास की दृष्टि हमें प्राप्त नहीं होती तब तक हम ईश्वर और भक्ति का रहस्य ह्रदयंगम नहीं कर सकते । राम के विवाह के पहले शिव के विवाह का तात्पर्य यह है कि जब तक हम श्रद्धा और विश्वास का अन्तःकरण में मिलन नहीं करा लेंगे, परिणय नहीं करा लेंगे तब तक हमारे ह्रदय में, हमारे अंतर्जीवन में भक्ति और भगवान का मिलन नहीं होगा । इस दृष्टि से देखने पर पार्वती और शंकर का विवाह श्रद्धा और विश्वास का मिलन है ।

Saturday, 5 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

श्रवण के बाद बोध की परम्परा का क्रमशः विस्तार होता है । उस विस्तार में जनकनन्दिनी सीता पुनः उसी सखी को आगे करके अन्वेषण करती हैं - वही सखी सीताजी को लेकर वहाँ गयी, जहाँ पर उसने श्रीराम को देखा था, किन्तु उन्हें श्रीराम वहाँ नहीं मिले । यह साधना-पद्धति का संकेत है । मान लीजिए कि वह सखी श्रीसीताजी को लेकर आती और दिखा देती कि ये रहे राम, तो क्या कमी थी ? परन्तु श्रीराम वहाँ नहीं मिले और इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि श्रीराम यदि वहीं मिल जाते हैं, जहाँ उस सखी को मिले थे, तो श्रीराम की व्यापकता सीमित हो जाती । अगर यह निश्चित हो जाय कि ईश्वर किसी एक स्थान विशेष में ही मिलेंगे, तो यह एक साधक का आग्रह तो हो सकता है, पर सर्वव्यापी ईश्वर के लिए यह बिल्कुल भी आवश्यक नहीं है कि वह स्वयं को किसी एक ही स्थान पर व्यक्त करे । वे तो कभी भी, कहीं भी प्रकट हो सकते हैं, इसलिए अपनी सर्वव्यापकता का ज्ञान कराने के लिए ही भगवान राम उसी स्थान पर श्रीसीताजी को नहीं दिखे, जहाँ पर सखी को दिखे थे । तब श्रीसीताजी के मन में उत्कण्ठा तथा व्याकुलता का उदय होता है -
      चितवति चकित चहूँ दिसि सीता ।
      कहँ गए नृप किसोर मनु चिता ।।
यह ईश्वर का, ज्ञान का अन्वेषण है ।

Friday, 4 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

श्रवण का यह क्रम ज्ञान के संदर्भ में भी है । सीताजी भगवान राम को किस क्रम से पाती हैं ? यहाँ भी वही क्रम है । ऐसा नहीं है कि श्रीसीताजी पुष्पवाटिका में गयीं और वहाँ उन्होंने श्रीराम को देख लिया । उन्होंने देखा नहीं, बल्कि पहले सुना । उनकी एक सखी बाग में फूल चुनने गयी थी और वहाँ उसने अचानक श्रीराम को देख लिया । लौटकर उसने श्रीसीताजी के समक्ष श्रीराम के सौन्दर्य का वर्णन किया । यहाँ पर भी वही सूत्र है । ज्ञान के संदर्भ में भी श्रुति की प्रधानता है । तात्पर्य यह है कि ज्ञान के भी दो रूप हैं - एक है परोक्ष ज्ञान और दूसरा अपरोक्ष ज्ञान । पहले सुनकर परोक्ष ज्ञान होता है और उसके बाद अनुभव के द्वारा अपरोक्ष ज्ञान होता है । भक्ति और ज्ञान, दोनों के संदर्भ में श्रवण का यह महत्व और क्रम समान है । सीताजी को पाने की दिशा में भी भगवान राम पहले देखते नहीं, सुनते हैं और भगवान राम को पाने की दिशा में भी सीताजी भगवान राम को पहले देखतीं नहीं, अपितु उनके बारे में सुनती हैं । और सुना भी तो किस पद्धति से ? ज्ञान की जो अनिर्वचनीयता है, उसी क्रम में - कैसे वर्णन करती हैं ? कहती हैं -
      स्याम गौर किमी कहौं बखानी ।
      गिरा अनयन नयन बिनु बानी ।।
जो देख रहा है वह बोल नहीं पाता और जो बोल रहा है वह देख नहीं पाता । यह ब्रह्म की, ज्ञान की अनिर्वचनीयता है । तात्पर्य यह है कि वह वाणी का नहीं, बल्कि अनुभूति का विषय है । सखी ही वह आचार्य है, जिसने परोक्ष ज्ञान के रूप में सीताजी के समक्ष ज्ञान की अनिर्वचनीयता का प्रतिपादन किया ।

Thursday, 3 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भक्ति पाने के संदर्भ में भगवान राम की यात्रा कहाँ से शुरू होती है ? - गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से भगवान राघवेन्द्र लक्ष्मणजी को साथ लेकर पुष्प लेने पुष्पवाटिका की ओर चले । पुष्प माने क्या ? पुष्प का एक नाम है सुमन। भगवान सुमन चुनने जा रहे हैं। यह सुमन शब्द बड़ा प्रतीकात्मक है । सुमन का एक अर्थ है फूल और दूसरा अर्थ है सुंदर मन । जैसे सुमन में सौरभ होता है, उसी तरह सुंदर मन में भी भक्ति का सौरभ होता है । इसका अभिप्राय यह है कि जैसे सौरभ का प्रेमी सुमन का संग्रह करता है, उसी तरह भक्ति-सौरभ के प्रेमी भगवान राम सुंदर मन का चयन करते हैं । भगवान राम सुमन चयन कर रहे थे, इसी बीच उनके कानों में सीताजी के आभूषणों की ध्वनि सुनाई पड़ी । उनके आभूषणों की ध्वनि क्या है ? यह ध्वनि है श्रुति । अभिप्राय यह है कि श्रुति के माध्यम से भक्तिदेवी के आगमन की सूचना प्राप्त होती है । भक्ति की ओर प्रस्थान संत की कृपा से और भक्ति का आगमन श्रुति के माध्यम से । नवधाभक्ति के प्रसंग में कहा गया है -
       प्रथम भगति संतन्ह कर संगा ।
       दूसरि रति मम कथा प्रसंगा ।।
पहले सत्संग और दूसरे क्रम में श्रवण । वैसे तो गोस्वामीजी लिख सकते थे कि भगवान राम फूल चुनने गये और अचानक श्रीसीताजी वहाँ आ गयीं । उन्होंने सीताजी को देखा और उनके सौंदर्य पर मुग्ध हो गये । किन्तु गोस्वामीजी कहते हैं कि  नहीं ! भगवान ने अभी सीताजी को नहीं देखा है, केवल उनके आभूषणों की ध्वनि उनके कानों में पड़ी है । इसका अभिप्राय यह है कि भक्ति की प्राप्ति के क्रम में श्रवण अनिवार्य है। भक्ति के प्रति जो अनुराग उत्पन्न होगा, उसके मूल में श्रवण ही होगा । श्रीसीताजी को पाने के संदर्भ में भगवान राम ने इसी क्रम का निर्वाह करके श्रवण के महत्व को प्रकट किया ।

Wednesday, 2 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

पुष्पवाटिका प्रसंग में श्रीसीताजी के द्वारा पार्वतीजी का जो पूजन है, वह श्रद्धा का पूजन है । इस प्रसंग में दोनों क्रम साथ-साथ चल रहे हैं । अगर ज्ञान पाना हो तो पहले श्रद्धा का आश्रय लें और भक्ति पाना हो तो पहले संत का आश्रय लें । यहाँ संयोगवश इन दोनों क्रम का मिलन हो जाता है । यह प्रसंग दोनों का समुच्चय है । भगवान राम के जीवन में भक्ति की उपलब्धि और श्रीसीताजी के जीवन में ज्ञान की उपलब्धि के क्रम का यहाँ पर बड़ा सांकेतिक वर्णन है ।

Tuesday, 1 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ............

दूसरी ओर हैं श्रीसीताजी । उन्होंने भगवान राम को पाया । उनका मार्ग कौन सा है ? उनका मूल प्रेरक कौन है ? श्रीसीताजी अपने चरित्र के माध्यम से दिखा देती हैं कि पार्वतीजी ही भगवान राम को पाने का माध्यम हैं । श्रीसीताजी पार्वतीजी का पूजन करने चलीं । वे वाटिका में आकर स्नान करती हैं और मंदिर में जाकर पार्वतीजी का पूजन करती हैं । वहाँ उन्हे श्रीराम के आगमन की सूचना मिलती है और अंत में श्रीराम का दर्शन होता है । दर्शन के बाद वे पुनः पार्वतीजी से प्रार्थना करती हैं और पार्वती उन्हें आशीर्वाद देती हैं कि तुम्हें राम मिलेंगे । यह क्रम का निर्वाह है कि अगर भक्ति पाना हो तो संत की कृपा चाहिए और ज्ञान पाना हो तो ? पार्वती कौन है ? वे हैं मूर्तिमती श्रद्धा और ज्ञान प्राप्त करने के लिए सूत्र दिया गया - 'श्रद्धावाल्लभते ज्ञानम्'। ज्ञान उन्हें प्राप्त होता है, जिनके अन्तःकरण में श्रद्धा है ।