भगवान राम ने श्रीसीताजी को पाया, क्रम तो प्रारंभ में वही है - भगवान श्रीराम महर्षि विश्वामित्र की आज्ञा से पुष्प लेने पुष्पवाटिका गये, वहाँ उन्होंने श्रीसीताजी के आभूषणों की ध्वनि सुनी, सुनकर उनके मन में अनुराग उत्पन्न हुआ । वे अपने अन्तर्मन की भावना को लक्ष्मणजी को सुनाते हुए गुरू के पास चले -
ह्रदयँ सराहत सीय लोनाई ।
गुर समीप गवने दोउ भाई ।।
इस क्रम का समापन कहाँ हुआ ? दोनों भाई गुरू के पास पहुँचे और भक्ति को पाने का क्रम यहीं पूरा हो जाता है । भगवान राम ने महर्षि विश्वामित्र के चरणों में प्रणाम करने के बाद, पुष्पवाटिका में उन्हें जैसा अनुभव हुआ, वे सारी बातें बड़ी सरलतापूर्वक कह दीं । गुरू नहीं पूछ रहे हैं कि इतनी देर कैसे हुई ? बिना पूछे ही भगवान राम स्वयं सारी बातें गुरू को बता देते हैं ।
पार्वतीजी कथा सुन रही थीं । भगवान शंकर से पूछ बैठीं - महाराज! श्रृंगार की चर्चा भी क्या कभी गुरू को सुनायी जाती है ? आपके राम तो बड़े विलक्षण हैं । श्रीराम श्रीसीताजी के सौन्दर्य को देखकर मुग्ध हुए, तो पहले छोटे भाई को सुना दिया और अब गुरूजी को सुना रहे हैं । श्रृंगार की बात न तो छोटे से कही जाती है और न बड़े से । इन्होंने तो छोटे से भी कह दिया और बड़े से भी । तब शंकरजी ने एक ही बात में समाधान कर दिया । बोले कि इसके बिना तो सीताजी मिलेंगी ही नहीं । भक्ति की पराकाष्ठा है सरलता । सरलता के बिना भक्ति नहीं मिल सकती । भक्ति को पाने का यही क्रम है ।
ह्रदयँ सराहत सीय लोनाई ।
गुर समीप गवने दोउ भाई ।।
इस क्रम का समापन कहाँ हुआ ? दोनों भाई गुरू के पास पहुँचे और भक्ति को पाने का क्रम यहीं पूरा हो जाता है । भगवान राम ने महर्षि विश्वामित्र के चरणों में प्रणाम करने के बाद, पुष्पवाटिका में उन्हें जैसा अनुभव हुआ, वे सारी बातें बड़ी सरलतापूर्वक कह दीं । गुरू नहीं पूछ रहे हैं कि इतनी देर कैसे हुई ? बिना पूछे ही भगवान राम स्वयं सारी बातें गुरू को बता देते हैं ।
पार्वतीजी कथा सुन रही थीं । भगवान शंकर से पूछ बैठीं - महाराज! श्रृंगार की चर्चा भी क्या कभी गुरू को सुनायी जाती है ? आपके राम तो बड़े विलक्षण हैं । श्रीराम श्रीसीताजी के सौन्दर्य को देखकर मुग्ध हुए, तो पहले छोटे भाई को सुना दिया और अब गुरूजी को सुना रहे हैं । श्रृंगार की बात न तो छोटे से कही जाती है और न बड़े से । इन्होंने तो छोटे से भी कह दिया और बड़े से भी । तब शंकरजी ने एक ही बात में समाधान कर दिया । बोले कि इसके बिना तो सीताजी मिलेंगी ही नहीं । भक्ति की पराकाष्ठा है सरलता । सरलता के बिना भक्ति नहीं मिल सकती । भक्ति को पाने का यही क्रम है ।
No comments:
Post a Comment