श्रीरामचरितमानस में अहंकार को एक अत्यंत जटिल रोग के रूप में प्रस्तुत किया गया है । कुछ रोग तो ऐसे हैं जो उत्पन्न होते हैं और समाप्त हो जाते हैं । ऐसे रोगों को सहन कर लेना तथा उनकी चिकित्सा करना अपेक्षाकृत सरल होता है । रोग यदि कुपथ्य या किसी विशेष परिस्थिति से उत्पन्न हुआ हो, तब तो उसे औषध तथा पथ्य के द्वारा दूर किया जा सकता है, किन्तु जो रोग जन्म से ही व्यक्ति के साथ लगा हो और जीवनभर उसके लगे रहने की संभावना हो, तब तो व्यक्ति यह सुनकर टूट जायेगा कि जीवनभर चिकित्सा में लगे रहना होगा और सर्वदा इस अति दुखद डमरुआ रोग को भोगना पड़ेगा और कहना न होगा कि अंत में मृत्यु का कारण भी वही बनेगा ।
No comments:
Post a Comment