Monday, 28 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

दक्ष का क्षुद्र 'अहं' विराट 'अहं' का विरोध कर रहा था । वीरभद्र ने उसे नष्ट कर दिया । तब देवताओं ने जाकर भगवान शंकर से प्रार्थना की तो वे मुस्कुराते हुए यज्ञस्थल पर आ गए और कहा - अच्छा ! अब हम दक्ष के गले पर नया शिर जोड़ देते हैं । पुराना शिर तो नहीं जोड़ेंगे, क्योंकि वह बड़ा झगड़ेवाला शिर है, वह तो अग्निकुण्ड में गया । व्यष्टि अहंकार वाला शिर वीरभद्र ने नष्ट कर दिया । अब कौन-सा शिर जोड़ेंगे ? उन्होंने कहा - बकरे का शिर ! बकरे का शिर जुड़ते ही दक्ष भगवान शंकर की स्तुति करने लगे । बड़ी सुन्दर स्तुति है वह । इसलिए आज भी शंकरजी के भक्तों में यह परम्परा चली आ रही है कि पूजा की पूर्णता के लिए अंत में बकरे की बोली अवश्य बोलना चाहिए । इसका अर्थ क्या है ? यह कि याद रखें कि अभिमान के कारण ही दक्ष की दुर्दशा हुई थी । भगवान शंकर की कृपा यही है कि वे अहंकार को नष्ट कर देते हैं और फिर ममता का परिचय देते हुए नया शिर जोड़ देते हैं । वे क्रोधी नहीं हैं, क्रोध में आकर किसी को मार डालने के लिए किसी का शिर नहीं काटते । वे तो बचाने के लिए शिर को काटते हैं ।

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