सीताजी व्याकुल होकर श्रीराम को पुष्पवाटिका में खोज रही हैं और तब ब्रह्म का साक्षात्कार हुआ, ज्ञान का साक्षात्कार हुआ । किस रूप में हुआ ? श्रीराम दिखायी तो दे रहे हैं, परन्तु लता की ओट में । यह सांकेतिक भाषा है । लता माया की प्रतीक है । माया के संदर्भ में वेदांतशास्त्र ब्रह्म के दो भेद करता है - सविशेष और निर्विशेष । जो लता से आवृत है, वह मानो सविशेष ब्रह्म है और जो लता से अनावृत होकर प्रकट हो जाता है वह निर्विशेष है । इसी क्रम से सीताजी भगवान राम का साक्षात्कार करती हैं और उन्हें अपने ह्रदय में धारण कर लेती हैं। यही ज्ञानप्राप्ति का क्रम है । ज्ञान प्राप्ति के जितने क्रम हो सकते हैं वे सभी सीताजी के चरित्र से सीखे जा सकते हैं । भक्ति पाने का भी यही क्रम है, पर एक अन्तर है । सीताजी ने भगवान राम को पाया, पर उनका मार्ग कुछ लम्बा निकला । पहले उन्होंने सुना, फिर खोजने निकलीं, व्याकुलता हुई, दिखायी पड़े तो पहले आड़ में दिखायी पड़े एवं फिर प्रत्यक्ष दिखायी पड़े । उसके बाद श्रीराम को छोड़कर जाना पड़ा, तो वे पार्वतीजी के मंदिर में गयीं । मंदिर में पार्वतीजी का वरदान मिला और तब उन्हें भगवान की प्राप्ति हुई ।
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