Saturday, 19 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

भगवान शिव के संबंध में दैत्यों अथवा दैत्यवृत्ति वालों की जो धारणा है, उनकी जो दृष्टि है, वे भगवान शिव के स्वरूप से जो प्रेरणा लेते हैं, वह भी बड़ा विलक्षण है । कभी-कभी अखबार में पढ़ने को मिलता है कि अमुक डाकू डाका डालने के पहले अमुक देवी या देवता की पूजा करता है । पढ़ने वाले गदगद हो जाते हैं - वाह ! डाकू होते हुए भी उसकी देवी-देवता पर कितनी भक्ति है । उस पर शंकरजी की कृपा है, तभी तो कोई उसका बाल भी बाँका नहीं कर पाता, उसे पकड़ नहीं सकता । तो क्या यही देवी-देवता की प्रसन्नता का लक्षण है, या फिर क्या यही भक्ति का लक्षण है ? हनुमानजी और शंकरजी को अब यही काम रह गया है कि कोई डाका डाले और वे उसकी सहायता करें ? इसका तात्विक अर्थ यह है कि दैत्य अहं का पुजारी होता है । इसे हम संक्षिप्त में यों कहें कि ये दो वृत्तियाँ हैं - एक क्षणिक और दूसरी स्थायी, जैसे सुरा और दूध । दूध पौष्टिक है और सुरा स्फूर्ति तथा उत्तेजना प्रदान करती है । देवदर्शन मानो दूध है और दैत्य दर्शन सुरा के समान है । दैत्य के जीवन में 'अहं' की प्रधानता है । अहं के लिए एक शब्द और है 'मद' और मद का अर्थ सुरा भी है । इसलिए दैत्यदर्शन सुरा के समान है ।
    .....आगे कल .....

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