Friday, 18 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

शिव का जो स्वरूप है, जो सत्य है, उसका हम क्या अर्थ लेते हैं ? क्या प्रेरणा लेते हैं ? यह बड़े महत्व की बात है । हम शिव का अर्थ वैराग्य लेते हैं या उत्छृंखलता, अद्वैत लेते हैं या द्वैत, मर्यादा का उल्लंघन लेते हैं या परम मुक्ति । उत्छृंखलता और मुक्ति बड़े निकट के तत्व हैं । मुक्ति में कोई बंधन नहीं है और उत्छृंखलता में भी । अब शिवजी की अवस्था उत्छृंखलता है या मुक्ति । दैत्य इसका अर्थ लेते हैं उत्छृंखलता और साधक लेते हैं मुक्ति । सच्चा साधक शिवजी के स्वरूप को अद्वैत की अवस्था समझता है, जहाँ व्यक्ति की क्षुद्र अहंता तथा ममता का द्वैत मिट जाता है और वह मुक्त हो जाता है । यही शिव का यथार्थ स्वरूप है ।

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