Tuesday, 15 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

गोस्वामीजी कहते हैं कि लंका राक्षसों की नगरी है । अब इन दुर्गुण-दुर्विचारों को चाहे आप रोग कह लीजिए या राक्षस, वह तो एक काव्य है । दोनों का अर्थ एक ही है । रोग भी व्यक्ति को नष्ट कर देते हैं और राक्षस भी । एक ओर तो विनयपत्रिका में यह कहा गया कि रावण का भाई कुम्भकर्ण अहंकार का प्रतीक है और दूसरी ओर जहाँ विराट भगवान का परिचय दिया गया, वहाँ बताया गया कि  शंकरजी मूर्तिमान अहंकार हैं । अब अहंकार के साथ यह कौन-सी समस्या जुड़ गयी ? कुम्भकर्ण भी अहंकार है और भगवान शंकर भी । एक ओर जहाँ रामायण का एक अत्यंत निन्दनीय और कठोर पात्र कुम्भकर्ण अहंकार का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर जिनकी पग-पग पर प्रशंसा और पूजा की जाती है, वे शंकरजी भी अहंकार के प्रतीक हैं । यही 'अहं' की सर्वव्यापकता है । यह 'अहं' शब्द कैसे बना ? इस पर संस्कृत साहित्य में एक प्रसिद्ध उक्ति प्रचलित है, जिसमें कहा गया कि वर्णमाला का पहला अक्षर 'अ' है । 'अ' से ही वर्णमाला प्रारंभ होती है और उसका अंतिम अक्षर 'ह' है । इसका तात्पर्य हुआ कि 'अ' से लेकर 'ह' तक सारे स्वर तथा व्यंजन जिसमें समाये हुए हों, सारी सृष्टि जिसमें समायी हुई हो, वही यह 'अहं' है ।

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