Monday, 21 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

कुछ लोग मानकर ही चलते हैं कि 'मैं' का नशा होगा तो जीवन में सफलता ही सफलता मिलेगी । दिखाई भी देता है कि लोग अपने जीवन में 'मैं' को पाल लेते हैं और इसी 'मैं' के द्वारा बड़े-बड़े काम कर रहे हैं । दैत्यदर्शन भी यही है । दैत्य यही तो कहता है कि हम शिव के उपासक हैं, 'मैं' के उपासक हैं । हम देवताओं की तरह प्रतीक्षा क्यों करें ? हममें पुरूषार्थ है, शक्ति है । हम क्यों यज्ञ करते बैठे रहेंगे ? सीधा आक्रमण करके छीन लेंगे । पुराणों में समुद्र-मंधन के प्रसंग में एक तात्विक गाथा है । देवता और दैत्य अमृत पाने के लिए समुद्र मंथन करते हैं, लेकिन जब अमृत मिला तो उसका बँटवारा बड़ा विचित्र हुआ । अमृत का पात्र तो एक ही था, पर इस पात्र से एक ओर दैत्यों के लिए सुरा और देवताओं के लिए अमृत गिर रहा था । इसका तात्विक तात्पर्य यह है कि एक ओर ज्ञान का अमृत है और दूसरी ओर अभिमान का सुरा । इन दोनों के बीच बस दैत्य और दैववृत्ति का ही अंतर है । जो ज्ञान का अमृत पी रहे हैं, वे देवताओं की पंक्ति में बैठे हुए हैं और जो अभिमान, पद, धन, बुद्धिमता, जाति आदि के रूप में किसी न किसी प्रकार की मदिरा पीकर उन्मत्त हो रहे हैं, वे दैत्यों की पंक्ति में बैठे हैं । यही दैत्यवृत्ति है ।

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