दक्ष ने भगवान शंकर को आमंत्रित नहीं किया । भगवान शंकर नहीं आये, तो ब्रह्मा और विष्णु भी नहीं आये । तब दक्ष के यज्ञ का क्या हुआ ? गोस्वामीजी ने कहा - विधिहीन, विश्वासहीन एवं यज्ञपुरुष से विहिन यज्ञ का रुद्रगणों ने विध्वंस करना आरंभ कर दिया । भृगु मंत्रों के महान ज्ञाता थे । उन्हें अपने ऋषित्व पर बड़ा अभिमान हुआ । उन्होंने अपने मंत्रों के प्रभाव से रुद्रगणों को परास्त कर दिया और अभिमान करने लगे कि देखो मैंने रुद्रगणों को परास्त कर दिया । लेकिन भगवान शंकर ने तुरंत वीरभद्र को भेजा । वीरभद्र ने यज्ञ तो नष्ट किया ही, साथ ही उन्होंने दक्ष के शिर को काटा तो नहीं परन्तु मरोड़कर तोड़ दिया और ब्रह्मकुण्ड में फेंक दिया । सारे देवता भगवान शंकर के पास गये और उनसे कहा - महाराज ! आपके गणों ने यज्ञ का ध्वंस कर दिया । भगवान शंकर हँसते हुए बोले - यज्ञ ध्वंस किया या यज्ञ पूर्ण किया ? स्धूल दृष्टि से देखें, तो यज्ञ का ध्वंस किया और सुक्ष्म दृष्टि से देखें, तो उन्होंने यज्ञ को पूरा किया । कैसे ? बोले - यज्ञ तो पूर्ण होता है आहुति के द्वारा और यज्ञ की अन्तिम आहुति है अहंता और ममता । जिस यज्ञ में यजमान अपने 'मैं' तथा 'मेरेपन' की आहुति देता है, वही सच्चे अर्थों में आहुति देकर यज्ञ पूरा करता है । सती के देहत्याग से मानो ममता की आहुति हो गयी और दक्ष के क्षुद्र 'अहं' की आहुति देने के लिए भगवान शंकर ने वीरभद्र को भेज दिया ।
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