Saturday, 5 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

श्रवण के बाद बोध की परम्परा का क्रमशः विस्तार होता है । उस विस्तार में जनकनन्दिनी सीता पुनः उसी सखी को आगे करके अन्वेषण करती हैं - वही सखी सीताजी को लेकर वहाँ गयी, जहाँ पर उसने श्रीराम को देखा था, किन्तु उन्हें श्रीराम वहाँ नहीं मिले । यह साधना-पद्धति का संकेत है । मान लीजिए कि वह सखी श्रीसीताजी को लेकर आती और दिखा देती कि ये रहे राम, तो क्या कमी थी ? परन्तु श्रीराम वहाँ नहीं मिले और इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि श्रीराम यदि वहीं मिल जाते हैं, जहाँ उस सखी को मिले थे, तो श्रीराम की व्यापकता सीमित हो जाती । अगर यह निश्चित हो जाय कि ईश्वर किसी एक स्थान विशेष में ही मिलेंगे, तो यह एक साधक का आग्रह तो हो सकता है, पर सर्वव्यापी ईश्वर के लिए यह बिल्कुल भी आवश्यक नहीं है कि वह स्वयं को किसी एक ही स्थान पर व्यक्त करे । वे तो कभी भी, कहीं भी प्रकट हो सकते हैं, इसलिए अपनी सर्वव्यापकता का ज्ञान कराने के लिए ही भगवान राम उसी स्थान पर श्रीसीताजी को नहीं दिखे, जहाँ पर सखी को दिखे थे । तब श्रीसीताजी के मन में उत्कण्ठा तथा व्याकुलता का उदय होता है -
      चितवति चकित चहूँ दिसि सीता ।
      कहँ गए नृप किसोर मनु चिता ।।
यह ईश्वर का, ज्ञान का अन्वेषण है ।

No comments:

Post a Comment