Sunday, 6 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

"भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ"
भगवती पार्वती मूर्तिमती श्रद्धा हैं और भगवान शंकर मूर्तिमान् विश्वास । इसके द्वारा वे यह संकेत करते हैं कि जब तक श्रद्धा और विश्वास की दृष्टि हमें प्राप्त नहीं होती तब तक हम ईश्वर और भक्ति का रहस्य ह्रदयंगम नहीं कर सकते । राम के विवाह के पहले शिव के विवाह का तात्पर्य यह है कि जब तक हम श्रद्धा और विश्वास का अन्तःकरण में मिलन नहीं करा लेंगे, परिणय नहीं करा लेंगे तब तक हमारे ह्रदय में, हमारे अंतर्जीवन में भक्ति और भगवान का मिलन नहीं होगा । इस दृष्टि से देखने पर पार्वती और शंकर का विवाह श्रद्धा और विश्वास का मिलन है ।

No comments:

Post a Comment