.....कल से आगे ........
अब अगर एक व्यक्ति को एक गिलास दूध दिया जाय तथा दूसरे व्यक्ति को एक गिलास सुरा और दोनों पी लें, तो तत्काल असर किस पर होगा ? सुरा पीने वाला ही तत्काल मतवाला हो उठेगा ! उसे तुरंत स्फूर्ति की अनुभूति होगी । बड़ी स्वाभाविक बात है कि दूध पीने से ऐसा नहीं होता । दूध का परिणाम तो बड़ा दूरगामी होता है, तत्काल तो कुछ पता नहीं चलता । इसलिए लोग जो इतनी बड़ी संख्या में शराब पीते हैं, उनमें इसी तात्कालिक स्फूर्ति को पाने की वृत्ति है, किन्तु यह स्फूर्ति क्षणिक तथा नकली होती है और थोड़ी देर में एक गहरा अवसाद देकर चली जाती है । इस तरह 'अहं' एक नकली स्फूर्ति है, जिसके द्वारा व्यक्ति जीवन में नकली सफलता पाने की नकली प्रेरणा प्राप्त करता है और प्रसन्न होता है, समाज में सफलता प्राप्त करने को उत्साहित होता है । एक सज्जन से पूछा गया - आप शराब क्यों पीते हैं ? कहने लगे - बिना पिये मुझसे बोला नहीं जाता और पीते ही मेरी वाग्धारा खुल जाती है । केवल शराब के संबंध में ही नहीं, कुछ लोग तो यह मानकर चलते हैं कि सफलता का मूलमंत्र ही 'अहं' है और यह 'अहं' भी मद ही है ।
अब अगर एक व्यक्ति को एक गिलास दूध दिया जाय तथा दूसरे व्यक्ति को एक गिलास सुरा और दोनों पी लें, तो तत्काल असर किस पर होगा ? सुरा पीने वाला ही तत्काल मतवाला हो उठेगा ! उसे तुरंत स्फूर्ति की अनुभूति होगी । बड़ी स्वाभाविक बात है कि दूध पीने से ऐसा नहीं होता । दूध का परिणाम तो बड़ा दूरगामी होता है, तत्काल तो कुछ पता नहीं चलता । इसलिए लोग जो इतनी बड़ी संख्या में शराब पीते हैं, उनमें इसी तात्कालिक स्फूर्ति को पाने की वृत्ति है, किन्तु यह स्फूर्ति क्षणिक तथा नकली होती है और थोड़ी देर में एक गहरा अवसाद देकर चली जाती है । इस तरह 'अहं' एक नकली स्फूर्ति है, जिसके द्वारा व्यक्ति जीवन में नकली सफलता पाने की नकली प्रेरणा प्राप्त करता है और प्रसन्न होता है, समाज में सफलता प्राप्त करने को उत्साहित होता है । एक सज्जन से पूछा गया - आप शराब क्यों पीते हैं ? कहने लगे - बिना पिये मुझसे बोला नहीं जाता और पीते ही मेरी वाग्धारा खुल जाती है । केवल शराब के संबंध में ही नहीं, कुछ लोग तो यह मानकर चलते हैं कि सफलता का मूलमंत्र ही 'अहं' है और यह 'अहं' भी मद ही है ।
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