श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में मन के रोगों की वर्णन करते हुए गोस्वामीजी प्रारंभ में ही कहते हैं -
सुनहु तात अब मानस रोगा ।
जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा ।।
अब उन मानस-रोगों का वर्णन सुनिए ! जिनसे सब लोग दुख पाते हैं । लेकिन जब मानस-रोग संबंधी उन सारी पंक्तियों को हम ध्यान से पढ़ेंगे, तो दिखाई देगा कि किसी-किसी रोग में दुख के साथ गोस्वामीजी एक अन्य विशेषण भी जोड़ देते हैं । आगे हम जिस पंक्ति पर चर्चा करने जा रहे हैं, उसमें भी दुख के साथ एक विशेषण जुड़ा हुआ है । गोस्वामीजी कहते हैं -
अहंकार अति दुखद डमरुआ ।
दंभ कपट मद मान नेहरुआ ।।
यहाँ उनका अभिप्राय यह है कि वैसे तो मन के सभी रोग दुखद होते हैं, परन्तु यह जो अहंकार का रोग है, वह 'अति दुखद' - अत्यंत दुख देने वाला है अर्थात यह अहंकार का डमरुआ अत्यंत दुख देने वाला रोग है । शरीर के रोगों के साथ मन के रोगों की तुलना करते हुए गोस्वामीजी अहंकार की तुलना शरीर के डमरुआ रोग से करते हैं । डमरुआ पेट का रोग हैं, जिसमें रोगी का पेट बहुत बढ़ जाता है और रोगी के लिए कुछ भी पचा पाना संभव नहीं होता और रोगी धीरे-धीरे शक्तिहीन होकर कालग्रस्त हो जाता है ।
सुनहु तात अब मानस रोगा ।
जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा ।।
अब उन मानस-रोगों का वर्णन सुनिए ! जिनसे सब लोग दुख पाते हैं । लेकिन जब मानस-रोग संबंधी उन सारी पंक्तियों को हम ध्यान से पढ़ेंगे, तो दिखाई देगा कि किसी-किसी रोग में दुख के साथ गोस्वामीजी एक अन्य विशेषण भी जोड़ देते हैं । आगे हम जिस पंक्ति पर चर्चा करने जा रहे हैं, उसमें भी दुख के साथ एक विशेषण जुड़ा हुआ है । गोस्वामीजी कहते हैं -
अहंकार अति दुखद डमरुआ ।
दंभ कपट मद मान नेहरुआ ।।
यहाँ उनका अभिप्राय यह है कि वैसे तो मन के सभी रोग दुखद होते हैं, परन्तु यह जो अहंकार का रोग है, वह 'अति दुखद' - अत्यंत दुख देने वाला है अर्थात यह अहंकार का डमरुआ अत्यंत दुख देने वाला रोग है । शरीर के रोगों के साथ मन के रोगों की तुलना करते हुए गोस्वामीजी अहंकार की तुलना शरीर के डमरुआ रोग से करते हैं । डमरुआ पेट का रोग हैं, जिसमें रोगी का पेट बहुत बढ़ जाता है और रोगी के लिए कुछ भी पचा पाना संभव नहीं होता और रोगी धीरे-धीरे शक्तिहीन होकर कालग्रस्त हो जाता है ।
No comments:
Post a Comment