Thursday, 31 March 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भगवान शंकर शिर को बदल देने की कला में बड़े निपुण हैं, लेकिन रावण के साथ उन्होंने ऐसा नहीं किया । रावण ने शंकरजी के सामने अपना शिर स्वयं काट दिया । क्यों ? उसने सोचा - इससे शिवजी प्रसन्न हो जायेंगे । भगवान शंकर ने कहा - अच्छा ! तुम्हारा शिर फिर से निकल आवे । रावण के शिर फिर से निकल आये । उन्होंने रावण का शिर नहीं बदला । गणेशजी का तथा अन्य लोगों का शिर तो बदल दिया, पर रावण के शिर का न तो मुण्डमाल बनाया और न ही उसे बदला । मानो यह रावण पर व्यंग्य था । रावण के दश शिर थे । उनके सामने जब भगवान शंकर प्रकट हुए, तो उसने देखा कि उनके पाँच मुख हैं । यह देखकर रावण के मन में सबसे पहले यही बात आयी कि चलो ! कम से कम मैं इनसे दुगना हूँ । भगवान शंकर ने कहा - भाई ! तुम्हारे शिर तुम्हारे ही पास रहें, तो अच्छा है, वे न तो काटने योग्य हैं, न बदलने योग्य हैं ।

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